Sunday, May 31, 2026

राज्यसभा रेस में पचौरी की एंट्री?


भोपाल। मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल लगातार बढ़ती जा रही है। सूत्रों के मुताबिक बीजेपी तीसरे उम्मीदवार के तौर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे सुरेश पचौरी के नाम पर गंभीरता से विचार कर रही है। माना जा रहा है कि पचौरी को मैदान में उतारकर बीजेपी कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक और पुराने कांग्रेस नेटवर्क में भी संदेश देना चाहती है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि सुरेश पचौरी उम्मीदवार बनते हैं तो कांग्रेस के कई पुराने नेता और उनके समर्थक खुलकर बीजेपी के पक्ष में सक्रिय हो सकते हैं। खासकर उन क्षेत्रों में जहां पचौरी का वर्षों तक प्रभाव रहा है, वहां इसका राजनीतिक असर देखने को मिल सकता है। हालांकि बीजेपी की रणनीति पूरी तरह कांग्रेस के उम्मीदवार पर भी निर्भर मानी जा रही है। सूत्रों की मानें तो यदि कांग्रेस कमलनाथ परिवार से किसी सदस्य को राज्यसभा चुनाव में उतारती है, तो बीजेपी तीसरा उम्मीदवार उतारने के फैसले पर पुनर्विचार कर सकती है। पार्टी फिलहाल कांग्रेस की चाल का इंतजार कर रही है। बीजेपी अगर सुरेश पचौरी को मैदान में उतारती है तो यह सिर्फ एक चुनावी फैसला नहीं होगा, बल्कि कांग्रेस को उसके ही पुराने गढ़ में चुनौती देने की रणनीति भी होगी। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने भी चुनौती होगी कि वह राज्यसभा चुनाव को सिर्फ संख्या बल का नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश का चुनाव बनाए। मध्य प्रदेश की राजनीति में कभी कांग्रेस के लिए वोट मांगने वाले सुरेश पचौरी अब बीजेपी के लिए राज्यसभा की लड़ाई लड़ें, इससे बड़ा सियासी प्रतीक शायद ही कोई हो। राजनीति में न स्थायी दोस्त होते हैं और न स्थायी दुश्मन, लेकिन राज्यसभा चुनाव ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि दल बदलने के बाद भी नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता खत्म नहीं होती, बल्कि कई बार और बढ़ जाती है। फिलहाल राज्यसभा चुनाव को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही उम्मीदवारों के जरिए बड़ा राजनीतिक संदेश देने की तैयारी में हैं। अब सबकी नजर कांग्रेस की अगली चाल और बीजेपी के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है।

दिल्ली का टिकट नहीं, एमपी की कमान! राज्यसभा रेस से दूर रहेंगे जीतू पटवारी?


भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज है। इस बीच कांग्रेस खेमे से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी राज्यसभा चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार नहीं होंगे। बताया जा रहा है कि पटवारी ने खुद पार्टी हाईकमान के सामने चुनाव लड़ने को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया और संगठन में अपनी भूमिका को प्राथमिकता देने की बात कही है। हालांकि कांग्रेस की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन दिल्ली से भोपाल तक सियासी गलियारों में इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। क्योंकि पिछले कुछ दिनों से जीतू पटवारी का नाम संभावित उम्मीदवारों में सबसे आगे माना जा रहा था। राजनीतिक जानकारों की मानें तो कांग्रेस फिलहाल मध्य प्रदेश में संगठन को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में पार्टी शायद जीतू पटवारी को प्रदेश की राजनीति में ही सक्रिय रखना चाहती है। आगामी नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों के साथ-साथ 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारियों को देखते हुए कांग्रेस किसी बड़े संगठनात्मक बदलाव के मूड में नहीं दिख रही। पटवारी के नाम के पीछे हटने की खबरों के बाद अब कांग्रेस के भीतर नए नामों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पार्टी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो संगठन, क्षेत्रीय संतुलन और जातीय समीकरण तीनों पर फिट बैठे। यही वजह है कि दिल्ली दरबार में कई दावेदारों की सक्रियता भी बढ़ गई है। कांग्रेस में राज्यसभा की सीट हमेशा सम्मान से ज्यादा संदेश की राजनीति मानी जाती है। इस बार भी तस्वीर कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है। भोपाल में नेता समर्थकों को आश्वस्त कर रहे हैं, तो दिल्ली में समर्थक अपने नेताओं को। राज्यसभा की एक सीट ने कांग्रेस के कई नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। लेकिन फिलहाल ऐसा लग रहा है कि जीतू पटवारी ने इस दौड़ में शामिल होने से पहले ही अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। अब सवाल यह है कि यह त्याग है, रणनीति है या फिर पार्टी का कोई बड़ा सियासी गणित? फिलहाल कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन इतना तय है कि जीतू पटवारी के नाम को लेकर बनी चर्चा अब नई दिशा में मुड़ती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि कांग्रेस राज्यसभा के लिए किस चेहरे पर दांव लगाती है और उसके पीछे का राजनीतिक संदेश क्या होगा।

Saturday, May 30, 2026

सिंधिया समर्थक मंत्रियों पर भड़के पन्नालाल शाक्य

विधायक पन्नालाल शाक्य ने अपनी ही सरकार के 2 मंत्रियों पर तीखी टिप्पणी की है। शहर में खराब बिजली व्यवस्था की शिकायत लेकर वे बिजली कंपनी के दफ्तर पहुंचे थे। वहां उन्होंने ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर और जिले के प्रभारी मंत्री गोविंद सिंह राजपूत की कार्यशैली पर सवाल उठाए। शाक्य ने ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर पर निशाना साधते हुए कहा कि वे दिखावे की राजनीति करते हैं। उन्होंने कहा कि पहले तो इस क्षेत्र को बदनामी से बचाओ। वो ऊर्जा मंत्री तो भगवान का बंदा है। मंत्री कभी बिजली के पोल पर चढ़ जाते हैं, तो कभी नाली में उतर जाते हैं, लेकिन जनता को दिखावा नहीं बल्कि काम करने वाला जनसेवक चाहिए।उन्होंने कहा कि वे भोपाल जाकर मुख्यमंत्री से ऐसे 'नाकारा' मंत्री को हटाने का अनुरोध करेंगे, जो सरकार की छवि खराब कर रहे हैं। पन्नालाल शाक्य ने जिले के प्रभारी मंत्री गोविंद सिंह राजपूत पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि प्रभारी मंत्री खुद को 'महाराजा' ज्योतिरादित्य सिंधिया से भी बड़ा समझते हैं। शाक्य ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि हवाई पट्टी पर प्रभारी मंत्री ने उन्हें "चलो हटो" कहकर किनारे कर दिया था। इन दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम साफ तौर पर बता रहे हैं कि पुराने भाजपाइयों के निशाने पर अब सिंधिया समर्थक आ गए हैं और यही कारण है कि कांग्रेस अब इस पर बार-बार चुटकी ले रही है गुना विधायक पन्नालाल शाक्य अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते रहे है,लेकिन पिछले कुछ दिनों से ऐसा माना जा रहा था कि वह ज्योतिरादित्य सिंधिया के संदर्भ में अपना रवैया बदल रहे हैं लेकिन शनिवार के घटनाक्रम ने एक बार फिर असल तस्वीर सामने ला दी है

Friday, May 29, 2026

किसानों की मेहनत रंग लाई, गेहूं उपार्जन में MP अव्वल

भोपाल। मध्यप्रदेश ने इस साल गेहूं उपार्जन में नया रिकॉर्ड बनाते हुए देशभर में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। प्रदेश में समर्थन मूल्य पर बड़े पैमाने पर गेहूं खरीदी होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किसानों को बधाई दी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों की मेहनत और सरकार की योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के कारण मध्यप्रदेश लगातार कृषि क्षेत्र में नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रदेश सरकार लगातार किसान हित में फैसले ले रही है। सरकार का फोकस सिर्फ समर्थन मूल्य पर खरीदी तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों को समय पर भुगतान, बेहतर व्यवस्थाएं और कृषि को लाभ का धंधा बनाने पर भी काम किया जा रहा है। प्रदेश में इस बार गेहूं खरीदी ने नया रिकॉर्ड बनाया है। सरकार के मुताबिक लाखों किसानों से समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदा गया है और भुगतान की प्रक्रिया भी तेजी से पूरी की जा रही है। गेहूं उपार्जन केंद्रों पर किसानों के लिए पेयजल, छाया, हेल्प डेस्क और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश पहले ही दिए गए थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश अब देश के प्रमुख कृषि राज्यों में अपनी अलग पहचान बना चुका है। सरकार लगातार सिंचाई, भंडारण, आधुनिक तकनीक और समर्थन मूल्य व्यवस्था को मजबूत करने पर काम कर रही है, ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम मिल सके। सरकार ने इस बार छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता देते हुए खरीदी व्यवस्था को आसान बनाने पर विशेष जोर दिया। प्रदेशभर में हजारों उपार्जन केंद्र बनाए गए और स्लॉट बुकिंग से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम से जोड़ा गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि किसान प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और उनकी समृद्धि ही राज्य के विकास की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भी किसान कल्याण और कृषि विकास से जुड़े फैसले लगातार लिए जाते रहेंगे।




एमपी बीजेपी में बड़ा मंथन, राज्यसभा के लिए किन नामों पर चल रही चर्चा?


भोपाल। मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर बीजेपी के भीतर हलचल तेज है। नेताओं के नाम दिल्ली पहुंच चुके हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम को लेकर हो रही है, वह है कैलाश विजयवर्गीय। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि वे राज्यसभा जाएंगे या नहीं... बल्कि यह भी कि क्या बीजेपी अब प्रदेश की राजनीति में नए शक्ति संतुलन की पटकथा लिख रही है? सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी की ओर से केंद्रीय नेतृत्व को भेजी गई संभावित नामों की सूची में कैलाश विजयवर्गीय, डॉ. नरोत्तम मिश्रा, विनोद भदौरिया, अखंड प्रताप सिंह, लालसिंह आर्य, रंजना बघेल, डामोर और संघ पृष्ठभूमि से जुड़े अभय महाजन के नाम शामिल हैं। लेकिन इन सबके बीच सबसे दिलचस्प चर्चा विजयवर्गीय को लेकर है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो यदि कैलाश विजयवर्गीय को राज्यसभा भेजा जाता है, तो यह सिर्फ एक संसदीय नियुक्ति नहीं होगी, बल्कि मध्यप्रदेश बीजेपी की अंदरूनी राजनीति में बड़ा संकेत भी माना जाएगा। माना जा रहा है कि इससे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और कैलाश विजयवर्गीय के बीच लंबे समय से चल रहे सियासी मनमुटाव और शक्ति संतुलन की चर्चा भी शांत हो सकती है। दरअसल, मोहन सरकार बनने के बाद से ही सत्ता और संगठन के भीतर दो अलग-अलग पावर सेंटर की चर्चा लगातार होती रही है। कैलाश विजयवर्गीय संगठन और केंद्रीय नेतृत्व में मजबूत पकड़ रखने वाले नेता माने जाते हैं, जबकि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपनी अलग कार्यशैली और टीम के साथ सरकार चला रहे हैं। कई राजनीतिक फैसलों और नियुक्तियों को लेकर दोनों खेमों के बीच अंदरखाने असहजता की खबरें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में यदि विजयवर्गीय को राज्यसभा भेजा जाता है, तो इसे बीजेपी की “वन एरो, मल्टीपल टारगेट” रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। एक तरफ केंद्र में अनुभवी चेहरा मिलेगा, दूसरी ओर प्रदेश कैबिनेट में बदलाव का रास्ता भी आसान हो जाएगा। राजनीतिक गलियारों में तो यहां तक चर्चा है कि विजयवर्गीय की राज्यसभा एंट्री, मोहन कैबिनेट से उनकी विदाई का रास्ता भी बन सकती है। उधर, नरोत्तम मिश्रा का नाम भी लगातार चर्चा में बना हुआ है। बीजेपी के एक बड़े ब्राह्मण चेहरे के रूप में उनकी वापसी की संभावनाओं को भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है। वहीं आदिवासी समीकरण साधने के लिए रंजना बघेल और डामोर के नामों पर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है।सबसे चौंकाने वाली एंट्री संघ पृष्ठभूमि से जुड़े अभय महाजन की मानी जा रही है। अचानक उनका नाम सामने आने के बाद कई नेताओं की राजनीतिक गणित बदलती दिखाई दे रही है। इससे यह भी संकेत मिल रहे हैं कि बीजेपी संगठन और संघ के संतुलन को भी साधने की कोशिश में है। फिलहाल, राज्यसभा की एक सीट ने बीजेपी के भीतर कई समीकरणों को गर्म कर दिया है। अब नजर दिल्ली पर टिकी है, क्योंकि अंतिम फैसला वहीं से होना है। लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि इस बार राज्यसभा सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश बीजेपी के भविष्य के सत्ता संतुलन का ट्रेलर साबित हो सकता है।

Thursday, May 28, 2026

प्रधानमंत्री मोदी का संभावित MP दौरा, ऊर्जा हब की देंगे सौगात



भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 जून को मध्यप्रदेश के दौरे पर आ सकते हैं। उनका नरसिंहपुर जिले के गाडरवाड़ा में प्रस्तावित कार्यक्रम होने की संभावना है, जहां वे एनटीपीसी सुपर थर्मल पावर स्टेशन की विस्तार परियोजना का भूमिपूजन कर सकते हैं। प्रधानमंत्री के संभावित दौरे को लेकर प्रशासनिक तैयारियां तेज हो गई हैं, हालांकि आधिकारिक कार्यक्रम अभी जारी नहीं हुआ है। जानकारी के मुताबिक, गाडरवाड़ा सुपर थर्मल पावर स्टेशन के विस्तार के तहत 1600 मेगावाट क्षमता की दो नई इकाइयां स्थापित की जाएंगी। यह परियोजना 2×800 मेगावाट क्षमता की होगी। इस विस्तार के बाद मध्यप्रदेश की बिजली उत्पादन क्षमता में बड़ा इजाफा होने की उम्मीद है। साथ ही प्रदेश की औद्योगिक और घरेलू बिजली जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी। बताया जा रहा है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना में आधुनिक अल्ट्रा सुपरक्रिटिकल तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे कम ईंधन में ज्यादा बिजली उत्पादन संभव हो सकेगा। इसके अलावा पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए एयर-कूल्ड कंडेंसर तकनीक का भी उपयोग किया जाएगा, जिससे पानी की खपत कम होगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर गाडरवाड़ा परियोजना के भूमिपूजन कार्यक्रम में शामिल होने का आग्रह किया था। मुख्यमंत्री ने इसे मध्यप्रदेश के ऊर्जा क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण परियोजना बताया था। गाडरवाड़ा पहले से ही प्रदेश के प्रमुख ऊर्जा केंद्रों में शामिल है। अब इस विस्तार परियोजना के जरिए न सिर्फ बिजली उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। निर्माण कार्य और परियोजना संचालन से हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना जताई जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित दौरे को लेकर बीजेपी और प्रशासनिक अमले में भी उत्साह का माहौल है। सुरक्षा व्यवस्था से लेकर कार्यक्रम स्थल की तैयारियों तक सभी व्यवस्थाओं पर तेजी से काम किया जा रहा है। माना जा रहा है कि यदि प्रधानमंत्री का दौरा तय होता है तो यह प्रदेश की ऊर्जा और औद्योगिक विकास योजनाओं के लिए बड़ा संदेश माना जाएगा।

हेमंत खंडेलवाल की नितिन नबीन से मुलाकात ने बदले राज्यसभा के समीकरण !

मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दलों में दावेदारों की लंबी सूची सामने आ रही है। सत्ता पक्ष भाजपा जहां अपने संगठन और सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटी है, वहीं कांग्रेस अपनी एकमात्र संभावित सीट बचाने की रणनीति बना रही है। इस बार का चुनाव केवल संख्या बल का नहीं, बल्कि राजनीतिक मैनेजमेंट, क्रॉस वोटिंग और अंदरूनी गुटबाजी की परीक्षा भी माना जा रहा है। मध्य प्रदेश से इस बार राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव होना है। इनमें वर्तमान सांसद दिग्विजय सिंह,, जार्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। मौजूदा विधानसभा गणित के हिसाब से भाजपा दो सीटों पर मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है, जबकि कांग्रेस एक सीट के लिए संघर्ष कर रही है। भाजपा की बात करें तो पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती दावेदारों के बीच संतुलन बनाने की है। भाजपा संगठन इस बार सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को प्राथमिकता दे रहा है पार्टी चाहती है कि राज्यसभा के जरिए ओबीसी, आदिवासी और महिला प्रतिनिधित्व का संदेश दिया जाए। इसी कारण कई नाम चर्चा में हैं। सबसे पहले वर्तमान सांसद जार्ज कुरियन का नाम सामने आता है। हालांकि वे राष्ट्रीय राजनीति में पहले से सक्रिय हैं और भाजपा नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं, इसलिए उनकी पुनः राज्यसभा वापसी लगभग तय मानी जा रही है। कुरियन भाजपा के क्रिश्चियन फेस और केरल की उम्मीद माने जाते है,,लेकिन पूरे कार्यकाल में उनकी मध्य प्रदेश से दूरी सवाल खड़े करती है दूसरा बड़ा नाम डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी का है। आदिवासी वर्ग से आने वाले सोलंकी को भाजपा फिर मौका दे सकती है। पार्टी आदिवासी वोट बैंक को लेकर काफी सतर्क है क्योंकि आगामी चुनावों में यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभा सकता है।हालांकि वो अपना इम्पैक्ट नहीं छोड़ पाय है और वर्तमान में।प्रदेश संगठन में महामंत्री भी बनाये गए हैं पूर्व गृहमंत्री और संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले नरोत्तम मिश्रा को लेकर भी अटकलें हैं। भाजपा उन्हें दिल्ली की राजनीति में बड़ी भूमिका दे सकती है। लेकिन दतिया में उपचुनाव की संभावना के चलते कुछ तय होना मुश्किल लग रहा है संगठन और राष्ट्रीय राजनीति में अनुभव होने के कारण कैलाश विजयवर्गीय का नाम भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा में बना हुआ है।लेकिन उनके विवादित बयानों से दिल्ली नाराज बताई जा रही है भाजपा के अंदर कुछ नए नाम भी तेजी से चर्चा में हैं। संगठन से जुड़े नेताओं का मानना है कि पार्टी इस बार किसी बड़े संगठनात्मक चेहरे को भी राज्यसभा भेज सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले नामों की चर्चा हो रही है। हालांकि भाजपा की रणनीति हमेशा अंतिम समय तक गोपनीय रखने की रही है। अब बात कांग्रेस की करें तो पार्टी की स्थिति भाजपा की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है। विधानसभा में संख्या कम होने के कारण कांग्रेस को अपनी एकमात्र सीट बचाने के लिए पूरी ताकत लगानी होगी। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कांग्रेस के पास दावेदार ज्यादा हैं और सीट केवल एक। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। लेकिन उन्होंने संकेत दिए हैं कि वे दोबारा राज्यसभा जाने के इच्छुक नहीं हैं। इससे कांग्रेस में नए दावेदारों के लिए रास्ता खुल गया है। कांग्रेस की ओर से सबसे चर्चित नाम जीतू पटवारी का माना जा रहा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष होनेके साथ उनका दिल्ली में प्रभाव भी काफी माना जाता है। हालांकि दिग्गज उन्हें चुनौती दे रहे है,लेकिन कांग्रेस के अंदर उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा कमलनाथ और उनके समर्थक खेमे के कुछ नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं। कमलनाथ गुट चाहता है कि राज्यसभा में ऐसा चेहरा जाए जो संगठन और संसदीय राजनीति दोनों में मजबूत हो। आर्थिक समीकरणों के लिहाज से नाथ परिवार के किसी सदस्य को मौका मिल सकता है,, लेकिन राहुल गांधी से कमलनाथ की दुरिया इसमें आड़े आ सकती हैं कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस किसी युवा या ओबीसी चेहरे पर भी दांव खेल सकती है, इनमें पहला नाम कमलेश्वर पटेल का है,, जो राहुल गांधी के करीबी तो है ही ,,उनकी विंध्य के मजबूत राजनैतिक पारिवारिक विरासत भी है ओबीसी चेहरों के फेहरिस्त में अरुण यादव का भी नाम है ,, लेकिन उन्हें फ़िलहाल किसी भी बड़े नेता का समर्थन नजर नहीं आता ,, साथ में लगातार चुनाव हारने का रिकॉर्ड उनके खिलाफ जाता दिखता है.. महिला चेहरों में।मीनाक्षी नटराजन के नाम की भी जमकर चर्चा है लेकिन दिग्विजय सिंह उनके विरोध में खुलकर मोर्चा खोले हुए है कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता क्रॉस वोटिंग की आशंका है। पार्टी नेतृत्व को डर है कि यदि कुछ विधायक टूटते हैं या मतदान के दौरान गड़बड़ी होती है, तो भाजपा तीसरी सीट पर भी दावा ठोक सकती है। यही वजह है कि कांग्रेस लगातार विधायकों की बैठकों और एकजुटता पर जोर दे रही है। भाजपा की रणनीति भी काफी आक्रामक दिखाई दे रही है। पार्टी नेताओं के बयान साफ संकेत दे रहे हैं कि भाजपा कांग्रेस की सीट पर भी नजर बनाए हुए है। भाजपा मानती है कि कांग्रेस के अंदर असंतोष है और यदि राजनीतिक परिस्थितियां बनीं तो तीसरी सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार राज्यसभा चुनाव केवल सांसद चुनने तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव 2028 के विधानसभा चुनावों की दिशा भी तय कर सकता है। भाजपा राज्यसभा के जरिए संगठन और सामाजिक संतुलन मजबूत करना चाहती है, जबकि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखकर यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी अभी भी मुकाबले में है। वैसे तो महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राज्यसभा चुनावों के जरिए दिल्ली की राजनीति में भी संदेश जाता है। भाजपा यदि अपने मजबूत और भरोसेमंद चेहरों को राज्यसभा भेजती है तो केंद्र में मध्य प्रदेश की भूमिका और मजबूत होगी। वहीं कांग्रेस यदि अपनी सीट बचाने में सफल रहती है तो यह उसके लिए मनोबल बढ़ाने वाला परिणाम होगा।कुल मिलाकर मध्य प्रदेश का राज्यसभा चुनाव इस बार बेहद रोचक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। भाजपा संख्या बल के आधार पर मजबूत दिख रही है, लेकिन कांग्रेस भी अपनी एक सीट बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। आने वाले दिनों में दावेदारों के नामों को लेकर दिल्ली से लेकर भोपाल तक बैठकों का दौर तेज होगा और अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान ही करेगा। फिलहाल इतना तय है कि राज्यसभा चुनाव के बहाने मध्य प्रदेश की राजनीति में गर्मी बढ़ चुकी है।

Wednesday, May 27, 2026

सिंधिया समर्थकों की इस्तीफे की तैयारी


भोपाल। मध्य प्रदेश बीजेपी में निगम-मंडलों और प्राधिकरणों की नियुक्तियों के बाद अब अंदरूनी नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। सबसे ज्यादा चर्चा सिंधिया खेमे को लेकर हो रही है। पार्टी और सरकार में अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिलने से ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों में बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि कुछ नेता संगठन और पदों से इस्तीफे जैसी रणनीति पर भी विचार कर रहे हैं। दरअसल, मोहन यादव सरकार द्वारा लगातार राजनीतिक नियुक्तियां की जा रही हैं, लेकिन सिंधिया समर्थकों को अब तक सीमित जगह ही मिल पाई है। जबकि 2020 में सत्ता परिवर्तन के दौरान सिंधिया के साथ खड़े रहने वाले कई नेताओं को उम्मीद थी कि उन्हें सरकार और संगठन में अहम जिम्मेदारियां मिलेंगी।

2020 में सत्ता परिवर्तन के हीरो, अब इंतजार में समर्थक

ज्योतिरादित्य सिंधिया जब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए थे, तब उनके साथ कई विधायकों और नेताओं ने भी पार्टी बदली थी। उसी राजनीतिक घटनाक्रम ने कमलनाथ सरकार गिराई और बीजेपी को दोबारा सत्ता में पहुंचाया। उस दौर में सिंधिया समर्थकों का प्रभाव सरकार और संगठन दोनों में साफ दिखाई देता था। शिवराज सरकार में सिंधिया खेमे के नेताओं को मंत्री पद और संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिली थीं। लेकिन अब हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं। निगम-मंडलों की सूची में सिंधिया समर्थकों को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में असंतोष बढ़ रहा है।

कई बड़े चेहरे अब भी इंतजार में

सिंधिया खेमे के जिन नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद थी, वे अब भी इंतजार कर रहे हैं। इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसौदिया, गिर्राज दंडोतिया, रघुराज कंसाना, मुन्नालाल गोयल और रक्षा संतराम सरोनिया जैसे कई नेताओं को अब तक कोई अहम पद नहीं मिला है। अब तक हुई नियुक्तियों में सिंधिया समर्थकों में सिर्फ दो नाम—सुधीर गुप्ता और अशोक शर्मा—को ही जगह मिल पाई है। यही वजह है कि समर्थकों के बीच यह संदेश जा रहा है कि पार्टी में सिंधिया खेमे का प्रभाव पहले जैसा मजबूत नहीं रहा।

इस्तीफे की अटकलों ने बढ़ाई हलचल

बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो कुछ सिंधिया समर्थक नेता लगातार खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि यदि आने वाले समय में राजनीतिक संतुलन नहीं साधा गया तो कुछ नेता संगठनात्मक पदों या जिम्मेदारियों से इस्तीफा देकर दबाव की राजनीति अपना सकते हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर किसी नेता ने इस्तीफे की बात नहीं कही है, लेकिन अंदरखाने बढ़ती नाराजगी को बीजेपी नेतृत्व गंभीरता से देख रहा है।

विरोधियों को मिली जगह, बढ़ी नाराजगी

सिंधिया समर्थकों की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में सिंधिया के विरोधी माने जाने वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिली हैं। केपी यादव और रामनिवास रावत जैसे नेताओं को अहम पद मिलने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि पार्टी अब नए शक्ति संतुलन पर काम कर रही है।

बीजेपी का फोकस अब संगठन आधारित राजनीति पर?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब प्रदेश में किसी एक नेता या गुट पर निर्भर रहने के बजाय संगठन आधारित राजनीति को मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश संगठन अपनी अलग कार्यशैली के साथ राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। फिलहाल, निगम-मंडलों की नियुक्तियों ने बीजेपी के भीतर सिंधिया खेमे की स्थिति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है। अब सभी की नजर आने वाले दिनों में होने वाली अगली राजनीतिक नियुक्तियों और संगठनात्मक फैसलों पर टिकी है, क्योंकि वही तय करेंगे कि बीजेपी में सिंधिया समर्थकों की नाराजगी शांत होती है या सियासी संकट और गहराता है।


योगमय हुआ खजुराहो, शुरू हुआ काउंटडाउन

खजुराहो। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के 25 दिवसीय काउंटडाउन के अवसर पर विश्व धरोहर नगरी खजुराहो में “योग महोत्सव 2026” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वर्चुअली संबोधित करते हुए योग और भारतीय संस्कृति के महत्व पर जोर दिया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि योग और खजुराहो, दोनों ही भारतीय संस्कृति के अभिन्न स्तंभ हैं। योग भारत की प्राचीन परंपरा और जीवन पद्धति का प्रतीक है, जबकि खजुराहो भारतीय कला, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत की पहचान है। उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संतुलन का माध्यम भी है। सीएम डॉ. यादव ने कहा कि राज्य सरकार योग को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़कर स्वस्थ, जागरूक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध समाज के निर्माण की दिशा में लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने लोगों से नियमित योग अपनाने और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने की अपील भी की। कार्यक्रम में योग साधकों, विद्यार्थियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। विश्व प्रसिद्ध खजुराहो की ऐतिहासिक धरोहरों के बीच आयोजित योग महोत्सव ने भारतीय संस्कृति और योग परंपरा की विशेष छाप छोड़ी। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 को लेकर प्रदेशभर में विभिन्न कार्यक्रमों और जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। खजुराहो में आयोजित यह योग महोत्सव उसी श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।




Saturday, May 23, 2026

इस बार एमपी बीजेपी में राज्यसभा के लिए बड़ी सुगबुगाहट!

 


भोपाल। मध्यप्रदेश बीजेपी में राज्यसभा चुनाव को लेकर अंदरखाने हलचल तेज हो गई है। पार्टी भले अभी खुलकर कुछ नहीं कह रही, लेकिन भोपाल से लेकर दिल्ली तक बैठकों और नामों की चर्चाओं ने सियासी गलियारों का तापमान बढ़ा दिया है। इस बार बीजेपी सिर्फ सीट भरने नहीं, बल्कि बड़े सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। सूत्रों के मुताबिक मोहन सरकार के दो वरिष्ठ मंत्रियों के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। संगठन और सरकार में सक्रिय इन चेहरों को दिल्ली भेजने के विकल्प पर पार्टी मंथन कर रही है। हालांकि अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर होना है, लेकिन दावेदारों की सक्रियता लगातार बढ़ती नजर आ रही है। सबसे ज्यादा चर्चा आदिवासी प्रतिनिधित्व को लेकर है। मौजूदा राज्यसभा सांसद सुमेर सिंह सोलंकी एक बार फिर मौका पाने के लिए प्रयासरत बताए जा रहे हैं। लेकिन पार्टी के भीतर इस बार नए आदिवासी चेहरे को आगे लाने की भी चर्चा तेज है। बीजेपी आगामी चुनावों से पहले आदिवासी वोट बैंक को बड़ा संदेश देने की तैयारी में मानी जा रही है। वहीं केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन की सीट को लेकर भी सस्पेंस बना हुआ है। सूत्रों का दावा है कि पार्टी इस सीट पर फिर किसी बाहरी लेकिन राष्ट्रीय स्तर के चेहरे को मौका दे सकती है। यानी मध्यप्रदेश से राज्यसभा भेजकर राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण साधने की तैयारी भी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार बीजेपी में दावेदारों की संख्या ज्यादा और सीटें सीमित हैं। ऐसे में संगठन अनुभव, सामाजिक समीकरण और केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे — तीनों का संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि कई बड़े नेता इन दिनों दिल्ली और भोपाल के बीच ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। कुल मिलाकर बीजेपी में राज्यसभा को लेकर “साइलेंट पॉलिटिक्स” तेज हो चुकी है। अब नजर सिर्फ इस बात पर है कि पार्टी संगठन के भरोसेमंद चेहरों पर दांव लगाएगी या फिर किसी नए नाम से सबको चौंकाएगी।

राज्यसभा के लिए "नाथ के साथ" दिल्ली


भोपाल। मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच कांग्रेस की इकलौती सीट पर सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी नाम की है, तो वो है पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ। पार्टी के भीतर भले कई चेहरे दावेदारी कर रहे हों, लेकिन सियासी गलियारों में सबसे मजबूत पकड़ अब भी “नाथ परिवार” की मानी जा रही है। यही वजह है कि राज्यसभा की इस एक सीट को लेकर कांग्रेस में अंदरखाने मंथन तेज हो गया है। 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के खाते में एक सीट आना लगभग तय माना जा रहा है। लेकिन इस सीट पर उम्मीदवार कौन होगा, यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है। सूत्रों की मानें तो क्रॉस वोटिंग के डर और संगठनात्मक पकड़ को देखते हुए पार्टी का एक बड़ा वर्ग कमलनाथ के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश में जुटा है। दरअसल, कमलनाथ सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि प्रदेश कांग्रेस में सबसे मजबूत राजनीतिक नेटवर्क रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। विधायकों पर पकड़, संसाधन जुटाने की क्षमता और दिल्ली दरबार तक सीधी पहुंच उन्हें बाकी दावेदारों से अलग खड़ा करती है। यही वजह है कि जब भी कांग्रेस मुश्किल में होती है, नजरें फिर “नाथ फैक्टर” पर टिक जाती हैं। सियासी चर्चा यह भी है कि अगर कमलनाथ राज्यसभा जाते हैं, तो छिंदवाड़ा से लेकर भोपाल तक कांग्रेस की राजनीति में बड़ा संदेश जाएगा। पार्टी के भीतर इसे “अनुभव बनाम प्रयोग” की लड़ाई के तौर पर भी देखा जा रहा है। राहुल गांधी की नई टीम युवा चेहरों को आगे बढ़ाना चाहती है, लेकिन मध्यप्रदेश में संगठन की जमीनी हकीकत अब भी कमलनाथ के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। हालांकि दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, जीतू पटवारी और कमलेश्वर पटेल जैसे नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं, लेकिन पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि इस समय कांग्रेस किसी “रिस्क” के मूड में नहीं दिख रही। यही कारण है कि कमलनाथ का नाम लगातार सबसे ऊपर चल रहा है। दिलचस्प बात यह भी है कि पिछले कुछ महीनों में कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ की राजनीतिक सक्रियता फिर बढ़ी है। दिल्ली से लेकर छिंदवाड़ा तक लगातार बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं ने यह संकेत दिए हैं कि “नाथ परिवार” अभी भी प्रदेश कांग्रेस की धुरी बना हुआ है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या कांग्रेस हाईकमान एक बार फिर मध्यप्रदेश में कमलनाथ पर भरोसा जताएगा? या फिर पार्टी किसी नए चेहरे पर दांव लगाकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करेगी? फिलहाल कांग्रेस की इस एक सीट ने पूरे प्रदेश की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है।

हनीट्रेप में एमपी के कौनसे माननीय!


भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों मौसम गर्मी से नहीं, बल्कि “Honeytrap 2.0” की फुसफुसाहटों से ज्यादा तप रहा है। सत्ता के गलियारों में अचानक पुराने चैट डिलीट होने लगे हैं, कुछ माननीयों ने फोन बदल लिए हैं, तो कुछ अब हर कॉल पर “भाई रिकॉर्डिंग तो नहीं हो रही?” पूछकर बात शुरू कर रहे हैं। अब “हनीट्रैप पार्ट-2” ने फिर कई बड़े चेहरों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इस बार चर्चा सिर्फ अफसरों या कारोबारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कुछ माननीयों और रसूखदार नेताओं के नाम भी सत्ता के कॉरिडोर में तैरते बताए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक इस पूरे नेटवर्क का तरीका बेहद फिल्मी लेकिन खतरनाक था। पहले सोशल मीडिया या जान-पहचान के जरिए संपर्क, फिर दोस्ती, फिर निजी मुलाकातें और वीडियो कॉल… और उसके बाद शुरू होता था “वीडियो वाले रिश्तों” का असली खेल। इस पूरे मामले में सागर की “मिस्ट्री गर्ल” रेशू उर्फ अभिलाषा चौधरी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। उसके कथित ऑडियो और चैट सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में बेचैनी और बढ़ गई है। कहा जा रहा है कि उसके संपर्क सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं थे, बल्कि भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर और रीवा तक फैले हुए थे। सबसे ज्यादा सनसनी उस दावे ने फैलाई है, जिसमें 100 से ज्यादा आपत्तिजनक वीडियो होने की चर्चा है। हालांकि जांच एजेंसियों ने किसी विधायक या नेता का नाम आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन सत्ता के गलियारों में हर कोई यही जानना चाहता है — “आखिर वो माननीय कौन हैं?” सूत्र यह भी बता रहे हैं कि कुछ वीडियो को लेकर कथित सौदेबाजी और “मैनेजमेंट” की कोशिशें भी हुईं। यही वजह है कि अब SIT गठन की चर्चाएं भी तेज हैं और कई लोग डर रहे हैं कि कहीं अगला खुलासा राजनीतिक भूचाल न ले आए।फिलहाल जांच जारी है… लेकिन भोपाल की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द शायद यही है -“भाई, चैट डिलीट कर देना…”

Friday, May 22, 2026

मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए अधिसूचना जारी,, कमलनाथ की दिल्ली की तैयारी..

मध्यप्रदेश में खाली होने वाली तीन राज्यसभा सीटों के लिए चुनावी तारीख घोषित हो गई है.. 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों को लेकर चुनाव होना है। चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। चुनाव आयोग की ओर से जानकारी दी गई है कि 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों पर 18 जून 2026 को चुनाव कराया जाएगा. मध्य प्रदेश की तीन सीटों पर होगा राज्यसभा चुनाव होंगे असल।में दिग्विजय सिंह ,जॉर्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी की राज्यसभा सीट हो रही है खाली। सूत्रों की माने तो कमलनाथ ये उनके परिवार को कोई सदस्य दिग्विजय की जगह राज्यसभा जा सकता है ,,हालांकि जीतू पटवारी भी कोशिश में लगे है,,, दूसरी तरफ बीजेपी में भी कैलाश विजयवर्गीय को राज्यसभा भेजने के कयास है ,, हालांकि अंदरखाने की खबर ये है कि प्रहलाद पटेल में कोशिश में जुटे हैं

Thursday, May 21, 2026

कहां अटका बीजेपी की प्रदेश कार्यसमिति का गठन?


भोपाल। मध्यप्रदेश बीजेपी की नई प्रदेश कार्यसमिति का गठन अब तक नहीं हो पाने से सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने मई में ओरछा में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक कराने के संकेत दिए थे, लेकिन मई खत्म होने को है और अब तक नई टीम का ऐलान नहीं हो पाया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर बीजेपी की नई कार्यसमिति का गठन कहां अटक गया है। दरअसल, इस बार संगठन प्रदेश कार्यसमिति को छोटा लेकिन ज्यादा प्रभावी बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक नई कार्यसमिति में केवल 106 सदस्यों को जगह देने की तैयारी है। यही फैसला अब संगठन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है, क्योंकि सीमित जगह में वरिष्ठ नेताओं, पुराने कार्यकर्ताओं, नए चेहरों और क्षेत्रीय समीकरणों के बीच संतुलन बैठाना आसान नहीं माना जा रहा। पार्टी संगठन इस बार कार्यसमिति में युवाओं, सक्रिय कार्यकर्ताओं और जमीन पर काम करने वाले नेताओं को मौका देने के मूड में दिखाई दे रहा है। वहीं कई वरिष्ठ नेता भी अपने समर्थकों को संगठन में जगह दिलाने के लिए सक्रिय बताए जा रहे हैं। ऐसे में नामों को लेकर लगातार मंथन और अंदरूनी चर्चा का दौर चल रहा है। सूत्रों की मानें तो प्रदेश और जिला कार्यसमितियों को लेकर अधिकांश नाम लगभग तय हो चुके हैं, लेकिन अंतिम सूची पर सहमति बनने में वक्त लग रहा है। संगठन कोई ऐसा संदेश नहीं देना चाहता जिससे किसी गुट या बड़े नेता की नाराजगी सामने आए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी इस बार संगठन में कम लेकिन मजबूत टीम के फार्मूले पर काम कर रही है। लेकिन दिग्गज नेताओं की लंबी फेहरिस्त और समर्थकों को साधने की कोशिशों ने प्रदेश कार्यसमिति के गठन को फिलहाल उलझा दिया है। अब नजर इस बात पर है कि प्रदेश नेतृत्व कब तक इस बहुप्रतीक्षित टीम का ऐलान करता है।

Wednesday, May 20, 2026

गेहूं बेचने वाले किसानों को सरकार ने दी बड़ी राहत

 


भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने गेहूं बेचने वाले किसानों को बड़ी राहत दी है। जिन किसानों ने 23 मई तक स्लॉट बुक कर लिया है, उनसे अब 28 मई तक गेहूं खरीदा जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने यह घोषणा करते हुए कहा कि सरकार किसान कल्याण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और किसी भी किसान का गेहूं खरीदी से नहीं छूटेगा। मुख्यमंत्री ने बताया कि कई किसानों ने स्लॉट तो बुक कर लिए थे, लेकिन खरीदी केंद्रों पर लंबी लाइन और अन्य व्यवस्थागत कारणों से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। किसानों की इसी समस्या को देखते हुए सरकार ने खरीदी की अंतिम तारीख बढ़ाने का फैसला लिया है। सीएम मोहन यादव ने कहा कि इस साल मध्यप्रदेश ने गेहूं खरीदी में अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया है। पिछले साल प्रदेश में करीब 77 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा गया था, जबकि इस बार सरकार 100 लाख मीट्रिक टन गेहूं उपार्जन का लक्ष्य हासिल करने जा रही है। अब तक करीब 91 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा जा चुका है। मुख्यमंत्री ने कहा कि पूरे देश में सबसे ज्यादा किसानों से गेहूं खरीदने वाला राज्य मध्यप्रदेश बना है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे चिंता न करें, सरकार सभी स्लॉट बुक किसानों का गेहूं खरीदेगी। डॉ. मोहन यादव ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों, भंडारण, बारदाना और ट्रांसपोर्ट जैसी दिक्कतों के बावजूद सरकार ने व्यवस्थाएं मजबूत की हैं। खरीदी केंद्रों पर किसानों को 2625 रुपए प्रति क्विंटल की दर से भुगतान किया जा रहा है। सरकार के इस फैसले से उन हजारों किसानों को राहत मिलेगी, जो स्लॉट बुक होने के बावजूद समय पर गेहूं नहीं बेच पा रहे थे।




तबादलों का रास्ता साफ! 1 जून से शुरू होंगे ट्रांसफर

भोपाल। मध्यप्रदेश के लाखों अधिकारियों और कर्मचारियों का लंबे समय से चला आ रहा इंतजार आखिर खत्म हो गया। मोहन कैबिनेट की बैठक में राज्य सरकार की तबादला नीति-2026 को मंजूरी दे दी गई है। नई नीति के तहत प्रदेश में 1 जून से 15 जून तक राज्य और जिला स्तर पर तबादले किए जाएंगे। सामान्य प्रशासन विभाग ने इसका ड्राफ्ट तैयार कर मुख्यमंत्री सचिवालय भेजा था, जिस पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मंत्रियों की सहमति के बाद अंतिम मुहर लगी। नई तबादला नीति में कर्मचारियों की सुविधाओं और मानवीय पहलुओं को भी प्राथमिकता दी गई है। सरकार ने तय किया है कि पति-पत्नी को एक ही स्थान पर पदस्थ करने के मामलों में विशेष तौर पर विचार किया जाएगा। वहीं गंभीर बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों को भी तबादलों में राहत दी जाएगी। मोहन कैबिनेट के फैसलों की जानकारी देते हुए मंत्री चेतन कश्यप ने बताया कि मुख्यमंत्री की ए प्लस नोटशीट वाले तबादले 31 मई तक किए जाएंगे। लंबित आवेदनों का भी निराकरण किया जाएगा। हालांकि इन्हें औपचारिक तबादला नीति का हिस्सा नहीं बनाया गया है, लेकिन प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई होगी। नई नीति के तहत जिलों के अंदर होने वाले तबादलों के अधिकार प्रभारी मंत्रियों को दिए गए हैं। वहीं स्कूल शिक्षा विभाग के लिए अलग से तबादला नीति तैयार की गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर यह तबादला नीति लागू नहीं होगी। सरकार ने ए प्लस नोटशीट वाले मामलों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता देने का फैसला किया है। इसके अलावा बीमारी या विशेष परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के आवेदन भी प्राथमिकता से निपटाए जाएंगे। मध्यप्रदेश की नई तबादला नीति को लेकर कर्मचारियों और अधिकारियों में उत्साह देखा जा रहा है। लंबे समय बाद आई इस नीति से कर्मचारियों को पारदर्शिता और राहत दोनों की उम्मीद है। वहीं मंत्रालय से लेकर जिलों तक अब तबादलों को लेकर हलचल तेज हो गई है।

Tuesday, May 19, 2026

अफसर-कर्मचारियों के तबादलों पर बड़ा अपडेट


भोपाल। मध्यप्रदेश में लंबे समय से तबादला नीति का इंतजार कर रहे सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए बड़ी खबर है। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2026 की नई तबादला नीति तैयार कर ली है। सामान्य प्रशासन विभाग यानी GAD ने इसका ड्राफ्ट तैयार कर मुख्यमंत्री सचिवालय को भेज दिया है।सूत्रों के मुताबिक बुधवार को होने वाली मोहन कैबिनेट की बैठक में इस नई ट्रांसफर पॉलिसी को मंजूरी मिल सकती है। माना जा रहा है कि मंजूरी के बाद प्रदेशभर में तबादलों का दौर शुरू होगा। नई नीति में विभागीय जरूरत, प्रशासनिक व्यवस्था और कर्मचारियों की लंबे समय से लंबित मांगों को ध्यान में रखा गया है। सरकार इस बार तबादला प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने की तैयारी में है। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में भी इस नीति को लेकर चर्चाएं तेज हैं, क्योंकि कैबिनेट मंजूरी के बाद कई विभागों में बड़े स्तर पर फेरबदल देखने को मिल सकते हैं। कर्मचारियों की नजर अब बुधवार की कैबिनेट बैठक पर टिकी हुई है।

एमपी में मंत्रिमंडल फेरबदल की आहट के बीच राज्यपाल से मिले हेमंत,, इन चेहरों पर संकट

मध्य प्रदेश में लगातार मंत्रिमंडल में फेरबदल के कयास लगाए जा रहे हैं इन कयासों के बीच में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने राज्यपाल से मुलाकात की है हालांकि खंडेलवाल ने कहा है कि फिलहाल मंत्रिमंडल में विस्तार की संभावनाएं कम है लेकिन जिस तरह से मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा हुई है उसके बाद कुछ मंत्रियों के संदर्भ में ना तो सत्ता खुश है ना ही संगठन, कुछ मंत्री लगातार स्वयं ही मंत्रिमंडल छोड़कर संगठन में आने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं, ऐसे में यह तय है कि मंत्रिमंडल में बदलाव जरूर होगा लेकिन माना जा रहा है कि अधिक मास के चलते इसे कुछ दिनों के लिए टाला जा सकता है इन मंत्रियों की हो सकती है छुट्टी गोविंद सिंह राजपूत दिलीप अहिरवार धर्मेंद्र लोधी प्रतिभा बागरी इन मंत्रियों के बदल सकते है विभाग राकेश सिंह उदयप्रताप सिंह नरेंद्र शिवाजी पटेल ये छोड़ना चाहते है पद कैलाश विजयवर्गीय प्रहलाद पटेल इन चेहरों की हो सकती है एंट्री शैलेंद्र जैन प्रभुराम चौधरी अर्चना चिटनिस

Monday, May 18, 2026

मोहन कैबिनेट की समीक्षा में मंत्रियों का छलका दर्द?

 


भोपाल। मध्यप्रदेश की सत्ता और संगठन ने जब मोहन कैबिनेट के मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड खोलकर देखा, तो कई मंत्रियों का दर्द और नाराजगी भी बाहर आ गई। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश की मौजूदगी में हुई हाई प्रोफाइल समीक्षा बैठक में मंत्रियों ने न सिर्फ विभागीय अफसरों पर सवाल उठाए, बल्कि अपने ही पार्टी नेताओं और कैबिनेट सहयोगियों को लेकर भी शिकायतें कर डालीं। सूत्रों के मुताबिक समीक्षा बैठक में सरकार से ज्यादा “सिस्टम” कटघरे में नजर आया। कई मंत्रियों ने खुलकर कहा कि उनके विभागों के अफसर उनकी सुनते ही नहीं हैं। कुछ मंत्रियों ने आरोप लगाया कि अधिकारी पार्टी नेताओं के काम में अड़ंगा डालते हैं और जनप्रतिनिधियों को गंभीरता से नहीं लेते। सबसे ज्यादा चर्चा स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास विभाग को लेकर रही। इन विभागों के मंत्रियों ने अपने अफसरों की कार्यशैली पर नाराजगी जताई। वहीं कैबिनेट मंत्री संपत्तिया उइके ने अपने प्रभार वाले जिले में मंत्री नागर सिंह चौहान के रवैये को लेकर अप्रत्यक्ष नाराजगी जाहिर की। इससे साफ संकेत मिले कि सरकार के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा। बैठक में एक मंत्री की शिकायत ने माहौल और गर्म कर दिया। मंत्री ने कहा कि विभागीय अफसर उन्हें मुख्यमंत्री तक से आसानी से नहीं मिलने देते। इस पर बैठक में मौजूद शीर्ष नेतृत्व ने नाराजगी जताई और अफसरशाही पर सवाल खड़े हुए।संगठन भी कई मंत्रियों के रवैये से असंतुष्ट नजर आया। जिला कोर कमेटियों को गंभीरता से नहीं लेने, जिलों में कम सक्रिय रहने और संगठन से तालमेल कमजोर होने पर मंत्रियों को सीधे तौर पर फटकार मिली। कुछ मंत्रियों ने प्रभार वाले जिलों में रात्रि विश्राम नहीं करने के ऐसे कारण गिनाए कि बैठक में मौजूद नेता भी हैरान रह गए। इस पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने साफ नाराजगी जताई। राजनीतिक गलियारों में अब सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या यह सिर्फ “रिव्यू मीटिंग” थी या फिर आने वाले मंत्रिमंडल फेरबदल की शुरुआती पटकथा। जिस तरह मंत्रियों की परफॉर्मेंस पर सवाल उठे और संगठन ने सख्त रुख दिखाया, उससे कई मंत्रियों की बेचैनी बढ़ गई है। सूत्रों का दावा है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और शिवप्रकाश कुछ मंत्रियों की कार्यशैली से बिल्कुल संतुष्ट नजर नहीं आए। इनमें दो महिला मंत्रियों के नाम भी चर्चा में बताए जा रहे हैं। ऐसे में अब सत्ता के गलियारों में यह सवाल तेजी से तैर रहा है कि क्या मोहन सरकार जल्द बड़ा राजनीतिक संदेश देने की तैयारी में है।

Sunday, May 17, 2026

हेमंत और मोहन ने बनाया मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड


भोपाल। मध्यप्रदेश की सियासत में इन दिनों सिर्फ मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं ही नहीं, बल्कि मंत्रियों की परफॉर्मेंस पर भी मंथन शुरू हो गया है। राजधानी भोपाल में शनिवार को करीब 8 घंटे तक चली हाई प्रोफाइल बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने मंत्रियों के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड देखा। सत्ता और संगठन दोनों ने मिलकर मंत्रियों से उनके विभागों की उपलब्धियां, टारगेट और जमीनी सक्रियता का हिसाब मांगा।मुख्यमंत्री निवास में हुई इस बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश, प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और संगठन के कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे। पहले दिन करीब 20 मंत्रियों के साथ विस्तार से चर्चा हुई, जबकि बाकी मंत्रियों के साथ सोमवार को समीक्षा की जाएगी। बैठक में मंत्रियों के प्रभार वाले जिलों में उनके दौरे, संगठनात्मक कार्यक्रमों में भागीदारी और स्थानीय नेताओं के साथ समन्वय पर विशेष फोकस रहा। संगठन ने मंत्रियों से यह भी पूछा कि जिलों में पार्टी और सरकार के बीच तालमेल किस स्तर पर काम कर रहा है। यानी साफ संकेत हैं कि अब सिर्फ विभाग संभालना ही नहीं, बल्कि राजनीतिक सक्रियता भी मंत्रियों की परफॉर्मेंस का हिस्सा होगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों, आंगनबाड़ी, गेहूं खरीदी और सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं की जमीनी प्रगति की जानकारी ली। चुनाव के समय जनता से किए गए वादों पर सरकार कितना आगे बढ़ी है, इसका भी आंकलन किया गया। मंत्रियों से उनके विभागों की उपलब्धियों और भविष्य के टारगेट पर भी विस्तार से चर्चा हुई। बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपेक्षाओं के मुताबिक पेट्रोल-डीजल बचत, सार्वजनिक परिवहन के उपयोग, वर्चुअल मीटिंग और वर्क फ्रॉम होम जैसे मुद्दों पर भी जोर दिया गया। सरकार और संगठन दोनों स्तर पर कार्यशैली को ज्यादा प्रभावी और समन्वित बनाने की रणनीति पर चर्चा हुई। राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि बैठक के दौरान मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल की अटकलें भी तेज रहीं। हालांकि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने साफ कहा कि फिलहाल मंत्रिमंडल विस्तार पर कोई चर्चा नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह मंत्रियों के कामकाज और संगठन से तालमेल की समीक्षा हुई, उससे सत्ता के गलियारों में कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। मंत्रियों के रिव्यू के तुरंत बाद बीजेपी कोर कमेटी की बैठक भी वर्चुअल माध्यम से आयोजित की जा रही है। वहीं सोमवार को नवनियुक्त निगम-मंडल अध्यक्षों का प्रशिक्षण कार्यक्रम रखा गया है, जिसमें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और संगठन के वरिष्ठ नेता उन्हें जनता से संवाद, व्यवहार और संगठनात्मक अनुशासन को लेकर मार्गदर्शन देंगे। सियासी गलियारों में अब चर्चा इस बात की है कि क्या यह सिर्फ समीक्षा बैठक है… या फिर आने वाले बड़े राजनीतिक बदलावों की भूमिका तैयार की जा रही है।