Tuesday, October 27, 2026

बैतूल समेत 12 जिले होंगे सूखाग्रस्त घोषित...

 एमपी कैबिनेट में महत्वपूर्ण चर्चा में बड़े फैसले लिए गए है




12 जिले सूखे घोषित करने की तैयारी के ली गई है,पीने के पानी के साथ किसानों पर  विशेष फोकस रखा जाएगा,,कैबिनेट में विशेष सहायता का प्रस्ताव पारित किया गया है,सरकार इन जिलों को सूखा ग्रस्त भी घोषित कर सकती है

इन जिलों में हुई है कम बारिश

• अलीराजपुर (सबसे अधिक वर्षा की कमी, सामान्य से करीब 52% कम)

• इंदौर

• उज्जैन

• बैतूल

• हरदा

• नर्मदापुरम

• रतलाम

• झाबुआ

• धार

• शाजापुर

• पांढुर्ना

कोर कमेटी की बैठक से सिंधिया-नरोत्तम रहे दूर, शिवराज की नाराजगी की चर्चा

MP BJP Core Committee Meeting:


 

भोपाल। मध्य प्रदेश भाजपा की कोर कमेटी की बैठक को लेकर प्रदेश की सियासत में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। बैठक में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं बैठक में मौजूद पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के नाराज नजर आने की चर्चाएं भी सियासी हलकों में चल रही हैं।

भाजपा की इस अहम बैठक में प्रदेश संगठन और आगामी राजनीतिक रणनीति से जुड़े कई मुद्दों पर मंथन हुआ। हालांकि सिंधिया और नरोत्तम मिश्रा के बैठक में शामिल नहीं होने को लेकर अलग-अलग चर्चाएं सामने आई हैं। इससे पहले एक बैठक में नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि उन्हें बैठक की सूचना नहीं मिली थी, जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया की गैरमौजूदगी की भी पुष्टि हुई थी।

नरोत्तम की गैरमौजूदगी पर सवाल

कोर ग्रुप की सूची में नाम होने के बावजूद नरोत्तम मिश्रा का बैठक में नहीं पहुंचना खास तौर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। उनकी गैरमौजूदगी को लेकर राजनीतिक विश्लेषक भाजपा के भीतर बदलते संगठनात्मक समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि मिश्रा की ओर से पहले यह स्पष्ट किया गया था कि उन्हें बैठक की सूचना नहीं मिली थी।

सिंधिया भी बैठक से दूर

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बैठक में शामिल नहीं होना भी राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय है। हालिया रिपोर्टों में कोर कमेटी की बैठक में सिंधिया की अनुपस्थिति की पुष्टि हुई है।

शिवराज को लेकर भी सियासी चर्चा

बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी के बीच उनके नाराज नजर आने की चर्चाओं ने भी सियासी पारा बढ़ाया है। हालांकि उनकी नाराजगी को लेकर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में इसे फिलहाल राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चा के तौर पर ही देखा जा रहा है। लेकिन कहा जा रहा है पूर्व सीएम बैठक के स्थल को पार्टी कार्यालय में चाह रहे थे...

संगठन के भीतर क्या चल रहा है?

एक तरफ भाजपा संगठन में नए पदाधिकारियों और नई जिम्मेदारियों के बाद बदलाव का दौर जारी है, तो दूसरी तरफ वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी और गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर संभावित नए समीकरणों को लेकर अटकलों को हवा दी है। अब सवाल यही है कि क्या ये महज संयोग हैं या मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर संगठनात्मक स्तर पर कोई बड़ा बदलाव आकार ले रहा है।

Friday, July 3, 2026

हेमंत खंडेलवाल के एक साल का कार्यकाल कितनी मिसाल,कितने सवाल !

मध्य प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपना एक साल पूरा कर लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर उनका यह एक साल का कार्यकाल कैसा रहा? क्या वे संगठन को नई दिशा देने में सफल रहे या फिर उनके सामने अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं?
जब हेमंत खंडेलवाल को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपी गई थी, तब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने की थी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार काम कर रही थी, वहीं संगठन को भी नई ऊर्जा देने की जरूरत महसूस की जा रही थी।
अपने एक साल के कार्यकाल में हेमंत खंडेलवाल ने संगठनात्मक गतिविधियों पर विशेष जोर दिया। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं से संवाद, विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन और संगठन के विस्तार पर उनका फोकस दिखाई दिया। पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं के बीच सक्रियता बढ़ाने के प्रयास भी किए गए।


हेमंत खंडेलवाल ने भाजपा कार्यालय में सरकार के मंत्रियों के बैठने की व्यवस्था शुरू की 

हेमंत खंडेलवाल की कार्यकाल में ही क्षेत्रीय स्तर के राजनीतिक विवाद उलझे 

सागर ,रीवा ,ग्वालियर, चंबल गुना में नेताओं में आपस में समन्वय बड़ा 

हेमंत ने आते ही सबसे ज्यादा जोर अनुशासन पर दिया 

हेमंत खंडेलवाल ने कार्यकर्ताओं को पोस्टर राजनीति से दूर रहने की सलाह दी गई 

खंडेलवाल ने प्रदेश अध्यक्ष होने के साथ-साथ अपने क्षेत्र बैतूल पर भी पूरा फोकस किया 
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा ने इस दौरान अपने जनाधार को बनाए रखने और संगठन को मजबूत रखने की दिशा में काम किया। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर खंडेलवाल लगातार जिलों के दौरे करते रहे और स्थानीय इकाइयों के साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश की। इसका फायदा संगठनात्मक मजबूती के रूप में देखने को मिला।
हालांकि विपक्ष का आरोप रहा कि भाजपा सरकार और संगठन जनता के मुद्दों पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके। कांग्रेस ने बेरोजगारी, महंगाई, किसानों और स्थानीय समस्याओं को लेकर सरकार और संगठन दोनों को घेरने की कोशिश की। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में खंडेलवाल को राजनीतिक जवाबदेही और संगठनात्मक संतुलन दोनों संभालने पड़े।

हेमंत खंडेलवाल का पहला साल विवादों से अपेक्षाकृत दूर और संगठन केंद्रित रहा। उन्होंने आक्रामक बयानबाजी की बजाय संगठनात्मक मजबूती पर ज्यादा ध्यान दिया। यही वजह है कि भाजपा के भीतर उन्हें एक समन्वयकारी नेता के रूप में देखा जाने लगा है।लेकिन चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। आगामी चुनावों की तैयारियां, कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं, सरकार के प्रदर्शन को जनता तक पहुंचाना और विपक्ष के आरोपों का जवाब देना आने वाले समय में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

Saturday, June 6, 2026

**दिग्गजों को पछाड़कर रजनीश अग्रवाल बने राज्यसभा उम्मीदवार-इनसाइड स्टोरी

मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मध्य प्रदेश से रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया है। उनकी उम्मीदवारी इसलिए चर्चा में है क्योंकि पार्टी में कई बड़े और चर्चित नेताओं के नाम चल रहे थे, लेकिन संगठन में लंबे समय से काम कर रहे रजनीश अग्रवाल पर नेतृत्व ने भरोसा जताया। एमपी बीजेपी के कई दिग्गज राज्यसभा की दौड़ में थे,, इनमे कैलाश विजयवर्गीय ,नरोत्तम मिश्रा और अरविंद भदौरिया जैसे नाम शामिल थे,, बीजेपी इस बार सामान्य चेहरे को मौका देना चाहती थी,, हेमन्त खंडेलवाल ने इन नामो के साथ ही रजनीश अग्रवाल का नाम भी आगे बढ़ाया,, दिल्ली ने कैलाश विजयवर्गीय के नाम को साफ नकार दिया,, नरोत्तम दतिया से उपचुनाव लड़ना चाहते है ,, भदौरिया को लेकर अमित शाह राजी नही थे ,, ऐसे में चौथे नाम रजनीश अग्रवाल पर सहमति बनी ... रजनीश अग्रवाल सागर जिले के मंडी बामोरा क्षेत्र से आते हैं और भाजपा संगठन में बूथ प्रबंधन व चुनावी रणनीति के विशेषज्ञ माने जाते हैं। वे वर्तमान में मध्य प्रदेश भाजपा में प्रदेश मंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। पार्टी के भीतर उनकी पहचान एक ऐसे संगठनकर्ता की है जो वर्षों से पर्दे के पीछे रहकर चुनावी मशीनरी को मजबूत करते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उनकी उम्मीदवारी का एक बड़ा संदेश यह भी है कि भाजपा ने चुनावी राजनीति के बड़े चेहरों के बजाय संगठन में लगातार काम करने वाले कार्यकर्ता को प्राथमिकता दी है। साथ ही, बुंदेलखंड क्षेत्र को प्रतिनिधित्व देने की दृष्टि से भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वे भाजपा की ओर से बुंदेलखंड से राज्यसभा पहुंचने वाले पहले नेता बन सकते हैं। भाजपा ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए तरुण चुग और रजनीश अग्रवाल को उम्मीदवार बनाया है। जिन सीटों पर चुनाव हो रहा है, उनमें वर्तमान राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह की सीट भी शामिल है **मुख्य बिंदु:** * भाजपा ने रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया। * संगठन और बूथ प्रबंधन के विशेषज्ञ माने जाते हैं। * कई चर्चित दिग्गज नेताओं के बीच उन्हें टिकट मिला। * बुंदेलखंड को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का बड़ा संदेश। * सागर जिले से राज्यसभा पहुंचने वाले पहले नेता बनने की संभावना।

Sunday, May 31, 2026

राज्यसभा रेस में पचौरी की एंट्री?


भोपाल। मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल लगातार बढ़ती जा रही है। सूत्रों के मुताबिक बीजेपी तीसरे उम्मीदवार के तौर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे सुरेश पचौरी के नाम पर गंभीरता से विचार कर रही है। माना जा रहा है कि पचौरी को मैदान में उतारकर बीजेपी कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक और पुराने कांग्रेस नेटवर्क में भी संदेश देना चाहती है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि सुरेश पचौरी उम्मीदवार बनते हैं तो कांग्रेस के कई पुराने नेता और उनके समर्थक खुलकर बीजेपी के पक्ष में सक्रिय हो सकते हैं। खासकर उन क्षेत्रों में जहां पचौरी का वर्षों तक प्रभाव रहा है, वहां इसका राजनीतिक असर देखने को मिल सकता है। हालांकि बीजेपी की रणनीति पूरी तरह कांग्रेस के उम्मीदवार पर भी निर्भर मानी जा रही है। सूत्रों की मानें तो यदि कांग्रेस कमलनाथ परिवार से किसी सदस्य को राज्यसभा चुनाव में उतारती है, तो बीजेपी तीसरा उम्मीदवार उतारने के फैसले पर पुनर्विचार कर सकती है। पार्टी फिलहाल कांग्रेस की चाल का इंतजार कर रही है। बीजेपी अगर सुरेश पचौरी को मैदान में उतारती है तो यह सिर्फ एक चुनावी फैसला नहीं होगा, बल्कि कांग्रेस को उसके ही पुराने गढ़ में चुनौती देने की रणनीति भी होगी। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने भी चुनौती होगी कि वह राज्यसभा चुनाव को सिर्फ संख्या बल का नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश का चुनाव बनाए। मध्य प्रदेश की राजनीति में कभी कांग्रेस के लिए वोट मांगने वाले सुरेश पचौरी अब बीजेपी के लिए राज्यसभा की लड़ाई लड़ें, इससे बड़ा सियासी प्रतीक शायद ही कोई हो। राजनीति में न स्थायी दोस्त होते हैं और न स्थायी दुश्मन, लेकिन राज्यसभा चुनाव ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि दल बदलने के बाद भी नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता खत्म नहीं होती, बल्कि कई बार और बढ़ जाती है। फिलहाल राज्यसभा चुनाव को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही उम्मीदवारों के जरिए बड़ा राजनीतिक संदेश देने की तैयारी में हैं। अब सबकी नजर कांग्रेस की अगली चाल और बीजेपी के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है।

दिल्ली का टिकट नहीं, एमपी की कमान! राज्यसभा रेस से दूर रहेंगे जीतू पटवारी?


भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज है। इस बीच कांग्रेस खेमे से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी राज्यसभा चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार नहीं होंगे। बताया जा रहा है कि पटवारी ने खुद पार्टी हाईकमान के सामने चुनाव लड़ने को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया और संगठन में अपनी भूमिका को प्राथमिकता देने की बात कही है। हालांकि कांग्रेस की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन दिल्ली से भोपाल तक सियासी गलियारों में इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। क्योंकि पिछले कुछ दिनों से जीतू पटवारी का नाम संभावित उम्मीदवारों में सबसे आगे माना जा रहा था। राजनीतिक जानकारों की मानें तो कांग्रेस फिलहाल मध्य प्रदेश में संगठन को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में पार्टी शायद जीतू पटवारी को प्रदेश की राजनीति में ही सक्रिय रखना चाहती है। आगामी नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों के साथ-साथ 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारियों को देखते हुए कांग्रेस किसी बड़े संगठनात्मक बदलाव के मूड में नहीं दिख रही। पटवारी के नाम के पीछे हटने की खबरों के बाद अब कांग्रेस के भीतर नए नामों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पार्टी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो संगठन, क्षेत्रीय संतुलन और जातीय समीकरण तीनों पर फिट बैठे। यही वजह है कि दिल्ली दरबार में कई दावेदारों की सक्रियता भी बढ़ गई है। कांग्रेस में राज्यसभा की सीट हमेशा सम्मान से ज्यादा संदेश की राजनीति मानी जाती है। इस बार भी तस्वीर कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है। भोपाल में नेता समर्थकों को आश्वस्त कर रहे हैं, तो दिल्ली में समर्थक अपने नेताओं को। राज्यसभा की एक सीट ने कांग्रेस के कई नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। लेकिन फिलहाल ऐसा लग रहा है कि जीतू पटवारी ने इस दौड़ में शामिल होने से पहले ही अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। अब सवाल यह है कि यह त्याग है, रणनीति है या फिर पार्टी का कोई बड़ा सियासी गणित? फिलहाल कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन इतना तय है कि जीतू पटवारी के नाम को लेकर बनी चर्चा अब नई दिशा में मुड़ती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि कांग्रेस राज्यसभा के लिए किस चेहरे पर दांव लगाती है और उसके पीछे का राजनीतिक संदेश क्या होगा।