Friday, October 30, 2026

Instagram पर कांग्रेस ने BJP को पछाड़ा, फॉलोअर्स दोगुने; 2028 में Gen Z बनेगा सत्ता की चाबी!

 


मध्यप्रदेश की सियासत में डिजिटल वॉर तेज, इंस्टाग्राम पर कांग्रेस के 12 लाख तो भाजपा के 6.80 लाख फॉलोअर्स | रोजगार, महंगाई और शिक्षा जैसे मुद्दों पर युवा वोटर की नजर

भोपाल। मध्यप्रदेश की सियासत में 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां भले ही अभी से राजनीतिक गलियारों में शुरू हो गई हों, लेकिन सत्ता की अगली लड़ाई का एक नया मैदान तैयार हो चुका है। यह मैदान है सोशल मीडिया का। खासकर इंस्टाग्राम, जहां राजनीतिक दलों की लोकप्रियता और युवाओं तक पहुंच की परीक्षा हो रही है। भाजपा और कांग्रेस के आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। यहां कांग्रेस ने भाजपा को फॉलोअर्स के मामले में करीब दोगुने अंतर से पीछे छोड़ दिया है।

मध्यप्रदेश भाजपा के आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट @bjp4mp पर करीब 22.6 हजार पोस्ट के साथ 6.80 लाख फॉलोअर्स हैं। वहीं, मध्यप्रदेश कांग्रेस के अकाउंट @incmp पर करीब 24.6 हजार पोस्ट के साथ 12 लाख फॉलोअर्स दर्ज हैं। यानी कांग्रेस के खाते में भाजपा के मुकाबले करीब 5.20 लाख ज्यादा फॉलोअर्स हैं। यह अंतर बताता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कांग्रेस की पहुंच भाजपा से आगे नजर आ रही है। हालांकि, फॉलोअर्स की संख्या को सीधे तौर पर चुनावी लोकप्रियता या वोट में बदलकर नहीं देखा जा सकता।

Gen Z पर नजर, क्योंकि 2028 की सियासत का यही है सबसे बड़ा फैक्टर

राजनीतिक दलों के लिए अब Gen Z यानी नई युवा पीढ़ी को साधना सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। यह वह पीढ़ी है जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है और राजनीतिक मुद्दों को भी रील, मीम, शॉर्ट वीडियो और ट्रेंडिंग कंटेंट के जरिए समझती है। पारंपरिक भाषणों के मुकाबले यह युवा सीधे सवाल पूछता है और नेताओं से जवाब की उम्मीद करता है।

कांग्रेस ने इंस्टाग्राम पर लगातार सक्रियता, ज्यादा पोस्ट और युवाओं से जुड़े मुद्दों को डिजिटल कंटेंट का हिस्सा बनाकर अपनी मौजूदगी मजबूत की है। दूसरी ओर भाजपा का संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत होने के बावजूद सोशल मीडिया पर युवाओं के बीच अपनी पकड़ और प्रभाव बढ़ाने की चुनौती दिखाई दे रही है।

भाजपा का 'रील बनाओ, इनाम पाओ' अभियान कितना सफल?

Gen Z को सोशल मीडिया के जरिए पार्टी से जोड़ने के लिए भाजपा युवा मोर्चा ने 'रील बनाओ, इनाम पाओ' प्रतियोगिता शुरू की थी। इसमें युवाओं को रील बनाने पर एक लाख रुपये तक का इनाम देने की घोषणा की गई थी। मकसद साफ था—युवाओं को डिजिटल प्रचार अभियान से जोड़ना और पार्टी की सोशल मीडिया पहुंच बढ़ाना।

लेकिन इंस्टाग्राम फॉलोअर्स के मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि इस तरह के प्रयासों के बावजूद भाजपा अभी कांग्रेस से पीछे है। हालांकि, केवल फॉलोअर्स के आधार पर इस अभियान को असफल घोषित करना उचित नहीं होगा। इसके वास्तविक असर को जानने के लिए रील की पहुंच, एंगेजमेंट और युवाओं की भागीदारी के आंकड़े भी जरूरी हैं।

2028 में करीब 65 लाख Gen Z वोटर बन सकते हैं निर्णायक

मध्यप्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में युवा मतदाताओं की भूमिका बेहद अहम रहने वाली है। उपलब्ध अनुमान के मुताबिक करीब 65 लाख Gen Z युवा पहली और दूसरी बार मतदान करने वाले संभावित मतदाता हो सकते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए इस वर्ग का भरोसा जीतना सत्ता तक पहुंचने की रणनीति का अहम हिस्सा होगा।

इस पीढ़ी की प्राथमिकताएं भी पारंपरिक राजनीति से कुछ अलग हैं। रोजगार, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, पेपर लीक, महंगाई, शिक्षा और भविष्य की संभावनाएं इसके लिए बड़े मुद्दे हैं। यह युवा केवल राजनीतिक वादे नहीं सुनना चाहता, बल्कि उनका हिसाब भी मांगता है।

आज का युवा टीवी पर लंबे भाषण देखने के बजाय मोबाइल स्क्रीन पर 30 सेकंड की रील में नेता और उसकी नीतियों को परखता है। ऐसे में सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों की सक्रियता केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि युवा मतदाताओं से संवाद का बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुकी है।

डिजिटल लोकप्रियता बनाम जमीनी संगठन, किसका पलड़ा रहेगा भारी?

मध्यप्रदेश की राजनीति में भाजपा का जमीनी संगठन और बूथ स्तर का नेटवर्क उसकी बड़ी ताकत है। वहीं इंस्टाग्राम के आंकड़े कांग्रेस की डिजिटल मौजूदगी को मजबूत दिखा रहे हैं। अब असली चुनौती दोनों दलों के सामने है—सोशल मीडिया की लोकप्रियता को जमीनी समर्थन में कैसे बदला जाए।

2028 के विधानसभा चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अपनी डिजिटल बढ़त को वोटों में बदल पाती है या भाजपा अपने मजबूत संगठन के दम पर युवाओं के बीच सोशल मीडिया की इस चुनौती का जवाब देती है।

फिलहाल इंस्टाग्राम के आंकड़ों ने मध्यप्रदेश की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस पार्टी के फॉलोअर्स ज्यादा हैं, बल्कि सवाल यह है कि 2028 में युवाओं की फीड पर किसका कंटेंट छाएगा और युवाओं के वोट किसके खाते में जाएंगे?

Thursday, October 29, 2026

इंदौर में संघ का महामंथन: मध्य प्रदेश सरकार से लेकर भाजपा शासित राज्यों तक क्या पड़ सकता है असर?



**विशेष राजनीतिक विश्लेषण | मध्य प्रदेश | संघ-भाजपा संबंध**




**इंट्रो:** राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक 2 से 4 नवंबर 2026 तक इंदौर में आयोजित होगी। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और देशभर के वरिष्ठ पदाधिकारी इस बैठक में शामिल होंगे। संघ ने शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की समीक्षा, संगठनात्मक गतिविधियों और समसामयिक राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा को बैठक का हिस्सा बताया है। ऐसे में इस बैठक पर मध्य प्रदेश की राजनीति के साथ-साथ भाजपा और उसकी सरकारों के कामकाज को लेकर होने वाली चर्चाओं के संदर्भ में भी नजर रहेगी। हालांकि, बैठक में सरकारों के प्रदर्शन की समीक्षा या किसी मुख्यमंत्री को लेकर निर्णय होने की आधिकारिक पुष्टि फिलहाल उपलब्ध जानकारी में नहीं है। 


## इंदौर से निकलेंगे राजनीतिक संकेत?


मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर एक बार फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महत्वपूर्ण संगठनात्मक गतिविधि का केंद्र बनने जा रही है। संघ की यह बैठक ऐसे समय हो रही है, जब संगठन अपने शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की समीक्षा और आगामी कार्ययोजना पर विचार करेगा। संघ की आधिकारिक घोषणा के मुताबिक, बैठक में नए मीडिया प्लेटफॉर्म की सामग्री, नशीले पदार्थों की समस्या, देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप और वैश्विक परिदृश्य जैसे विषयों पर चर्चा होगी। 


राजनीतिक दृष्टि से इस बैठक का महत्व इसलिए भी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच वैचारिक एवं संगठनात्मक संबंध लंबे समय से भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। हालांकि, संघ की संगठनात्मक बैठक और भाजपा की औपचारिक राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया अलग-अलग हैं। इसलिए बैठक में होने वाली चर्चा को सीधे सरकारों के भविष्य से जोड़ने के बजाय उसके संभावित राजनीतिक संकेतों और बाद की गतिविधियों के आधार पर समझना अधिक उचित होगा।


## मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार पर क्या होगा असर?


मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के लिए इस बैठक को संगठन और सरकार के बीच संवाद के व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मौजूदगी में सामाजिक मुद्दों, जनसंपर्क, संगठन की गतिविधियों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श होगा। इन विषयों का असर राजनीतिक विमर्श में किस रूप में दिखाई देता है, यह बैठक के बाद सामने आने वाली जानकारियों से स्पष्ट होगा।


मध्य प्रदेश की राजनीति में सरकार के प्रदर्शन का आकलन कई स्तरों पर होता है। इनमें सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन, रोजगार, निवेश, किसानों की समस्याएं, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और आम नागरिकों तक सरकारी सुविधाओं की पहुंच शामिल हैं।


यदि बैठक के बाद संघ और भाजपा के सार्वजनिक कार्यक्रमों में इन मुद्दों पर अधिक जोर दिखाई देता है, तो उसे संगठन की प्राथमिकताओं के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन केवल किसी विषय पर चर्चा होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सरकार को कोई निर्देश दिया गया है या उसके नेतृत्व में बदलाव होने वाला है।


## सरकार और संगठन के बीच तालमेल की होगी अहमियत


भाजपा की राजनीति में सरकार और संगठन के बीच समन्वय महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार जहां नीतियों, योजनाओं और प्रशासनिक निर्णयों के जरिए काम करती है, वहीं पार्टी संगठन जनता और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद तथा राजनीतिक गतिविधियों का संचालन करता है। संघ की सामाजिक और वैचारिक गतिविधियां इस व्यापक राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य का एक अन्य पक्ष हैं।


इंदौर की बैठक के बाद मध्य प्रदेश में संगठनात्मक गतिविधियों, सामाजिक अभियानों और जनसंपर्क कार्यक्रमों में किसी तरह की नई प्राथमिकता सामने आती है या नहीं, यह देखने योग्य होगा। इसी तरह, राज्य सरकार की योजनाओं और उनके जमीनी क्रियान्वयन पर सार्वजनिक चर्चा में बदलाव आता है या नहीं, यह भी राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन सकता है।


फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि बैठक से मोहन यादव सरकार की कार्यशैली, नेतृत्व या मंत्रिमंडल पर कोई प्रत्यक्ष फैसला होगा। ऐसे किसी निष्कर्ष के लिए आधिकारिक बयान, घोषित निर्णय या उसके बाद की ठोस घटनाएं आवश्यक होंगी।


## क्या भाजपा शासित दूसरे राज्यों की सरकारों पर भी पड़ेगा प्रभाव?


इंदौर की बैठक में संघ के संगठनात्मक ढांचे के सभी 46 प्रांतों और 11 क्षेत्रों के पदाधिकारियों की भागीदारी अपेक्षित है। इस कारण बैठक का दायरा केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है। इसमें राष्ट्रीय स्तर के विषयों और देशभर में चल रही संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा का महत्व भी रहेगा।


भाजपा शासित अन्य राज्यों में सरकारों के कामकाज को लेकर चर्चा के संभावित प्रभाव को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।


**पहला—संगठनात्मक प्राथमिकताएं:** यदि बैठक के बाद संघ अपने सामाजिक अभियानों, जनसंपर्क और संगठनात्मक विस्तार को लेकर नई प्राथमिकताएं घोषित करता है, तो अलग-अलग राज्यों में संघ की गतिविधियों के स्वरूप पर इसका असर पड़ सकता है।


**दूसरा—सामाजिक मुद्दे और सरकारी नीतियां:** नशे की समस्या, पर्यावरण संरक्षण और डिजिटल माध्यमों की सामग्री जैसे विषयों पर चर्चा राज्यों में चल रहे सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, इन मुद्दों पर केंद्र या राज्य सरकारों की नीतियां बदलने के लिए अलग से सरकारी निर्णय और आधिकारिक घोषणाएं जरूरी होंगी।


**तीसरा—सरकार और संगठन का संवाद:** भाजपा शासित राज्यों में पार्टी संगठन और सरकारों के बीच तालमेल राजनीतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण पहलू है। बैठक के बाद यदि संवाद, समीक्षा या जनसंपर्क से जुड़े कार्यक्रम सामने आते हैं, तो उन्हें इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। लेकिन किसी विशेष मुख्यमंत्री या राज्य सरकार के प्रदर्शन पर संघ की ओर से निर्णय होने का दावा तब तक उचित नहीं होगा, जब तक इसकी पुष्टि न हो।


इस प्रकार, बैठक का राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक महत्व स्पष्ट है, जबकि अलग-अलग राज्यों की सरकारों पर उसका प्रत्यक्ष प्रभाव बैठक के निष्कर्षों और बाद के घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।


## संघ की बैठक में किन मुद्दों पर रहेगी नजर?


संघ की आधिकारिक घोषणा और बैठक को लेकर प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर कुछ प्रमुख बिंदु महत्वपूर्ण रहेंगे।


**1. शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की समीक्षा**


संघ ने पिछले एक वर्ष के दौरान आयोजित शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की समीक्षा को बैठक के एजेंडे में शामिल किया है। इससे संगठन की गतिविधियों और आगामी कार्ययोजना को समझने में मदद मिल सकती है।


**2. संगठनात्मक ढांचे में संभावित बदलाव**


बैठक से पहले कुछ मीडिया रिपोर्टों में संघ के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की संभावना का उल्लेख किया गया है। इन रिपोर्टों में प्रांत और संभाग स्तर की व्यवस्थाओं से जुड़े प्रस्तावों की चर्चा हुई है। इन बदलावों के अंतिम स्वरूप और क्रियान्वयन को लेकर आधिकारिक पुष्टि तथा बैठक के बाद की घोषणा पर नजर रहेगी।


**3. नशे की समस्या और सामाजिक सरोकार**


नशीले पदार्थों की समस्या संघ के घोषित एजेंडे में शामिल है। इस विषय पर चर्चा का महत्व सामाजिक जागरूकता, जनभागीदारी और संबंधित संस्थाओं की भूमिका के संदर्भ में देखा जा सकता है।


**4. डिजिटल माध्यमों की सामग्री**


नए मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री भी चर्चा के विषयों में शामिल है। डिजिटल संचार, सामाजिक प्रभाव और बदलते सूचना परिवेश को लेकर संघ की प्राथमिकताओं पर बैठक के बाद आने वाले बयानों से अधिक स्पष्टता मिल सकती है।


**5. राष्ट्रीय और वैश्विक परिस्थितियां**


देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप और वैश्विक परिदृश्य पर चर्चा भी घोषित एजेंडे का हिस्सा है। इन विषयों का राजनीतिक विमर्श पर प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन इसके आधार पर किसी विशिष्ट सरकारी फैसले की पहले से घोषणा करना उचित नहीं होगा।


## क्या बैठक भाजपा के लिए नई राजनीतिक दिशा का संकेत बनेगी?


यह सवाल राजनीतिक हलकों में स्वाभाविक रूप से उठ सकता है कि संघ की बैठक से भाजपा की आगामी गतिविधियों और सरकारों की प्राथमिकताओं के बारे में कोई संकेत मिलेगा या नहीं।


इसका जवाब बैठक के बाद सामने आने वाली आधिकारिक जानकारी से ही स्पष्ट होगा। यदि संघ अपनी आगामी संगठनात्मक कार्ययोजना, सामाजिक अभियानों या जनसंपर्क गतिविधियों के बारे में कोई नई घोषणा करता है, तो भाजपा के राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रमों के संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया जा सकेगा।


हालांकि, संघ की संगठनात्मक प्राथमिकताओं और भाजपा की चुनावी या सरकारी रणनीति को एक ही निर्णय प्रक्रिया मानना सही नहीं होगा। किसी सरकार की नीतियों में बदलाव, मंत्रिमंडल में फेरबदल या मुख्यमंत्री के नेतृत्व से जुड़ा फैसला संबंधित राजनीतिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं के जरिए ही सामने आएगा।


## मध्य प्रदेश के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बैठक?


इंदौर में बैठक आयोजित होने से मध्य प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर की संगठनात्मक गतिविधियों का केंद्र बनने का अवसर मिल रहा है। राज्य की राजनीति में इस आयोजन का महत्व संघ के राष्ट्रीय नेतृत्व और विभिन्न राज्यों के पदाधिकारियों की मौजूदगी के कारण भी है।


लेकिन प्रदेश के राजनीतिक भविष्य का आकलन केवल इस बैठक के आधार पर नहीं किया जा सकता। सरकार की योजनाओं के नतीजे, जनता से जुड़े मुद्दे, भाजपा संगठन की गतिविधियां, विपक्ष की भूमिका और आने वाले समय में होने वाले प्रशासनिक व राजनीतिक फैसले भी महत्वपूर्ण रहेंगे।


बैठक के बाद यदि मध्य प्रदेश सरकार या भाजपा संगठन की ओर से कोई नई पहल सामने आती है, तो उसके उद्देश्य, स्वरूप और क्रियान्वयन का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण किया जा सकेगा।


## निष्कर्ष: बैठक के फैसलों से ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे उनके बाद के संकेत


इंदौर में 2 से 4 नवंबर 2026 तक होने वाली संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक संगठन के शताब्दी वर्ष की समीक्षा और आगामी कार्ययोजना के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसका दायरा राष्ट्रीय है और इसमें देशभर के वरिष्ठ पदाधिकारी भाग लेंगे।


मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार और भाजपा शासित अन्य राज्यों के संदर्भ में बैठक की राजनीतिक प्रासंगिकता इस बात से तय होगी कि इसके बाद कौन-सी आधिकारिक घोषणाएं होती हैं, संगठन की प्राथमिकताओं में क्या बदलाव सामने आते हैं और सरकारें अपने कामकाज में क्या ठोस कदम उठाती हैं।


फिलहाल इसे सरकारों के प्रदर्शन पर किसी निश्चित फैसले या नेतृत्व परिवर्तन की बैठक बताने के बजाय एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक आयोजन के रूप में देखना अधिक तथ्यपरक होगा। इंदौर से निकलने वाले वास्तविक राजनीतिक संकेत बैठक के बाद सामने आने वाली घोषणाओं और घटनाक्रम से ही स्पष्ट होंगे।


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Tuesday, October 27, 2026

बैतूल समेत 12 जिले होंगे सूखाग्रस्त घोषित...

 एमपी कैबिनेट में महत्वपूर्ण चर्चा में बड़े फैसले लिए गए है




12 जिले सूखे घोषित करने की तैयारी के ली गई है,पीने के पानी के साथ किसानों पर  विशेष फोकस रखा जाएगा,,कैबिनेट में विशेष सहायता का प्रस्ताव पारित किया गया है,सरकार इन जिलों को सूखा ग्रस्त भी घोषित कर सकती है

इन जिलों में हुई है कम बारिश

• अलीराजपुर (सबसे अधिक वर्षा की कमी, सामान्य से करीब 52% कम)

• इंदौर

• उज्जैन

• बैतूल

• हरदा

• नर्मदापुरम

• रतलाम

• झाबुआ

• धार

• शाजापुर

• पांढुर्ना

कोर कमेटी की बैठक से सिंधिया-नरोत्तम रहे दूर, शिवराज की नाराजगी की चर्चा

MP BJP Core Committee Meeting:


 

भोपाल। मध्य प्रदेश भाजपा की कोर कमेटी की बैठक को लेकर प्रदेश की सियासत में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। बैठक में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं बैठक में मौजूद पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के नाराज नजर आने की चर्चाएं भी सियासी हलकों में चल रही हैं।

भाजपा की इस अहम बैठक में प्रदेश संगठन और आगामी राजनीतिक रणनीति से जुड़े कई मुद्दों पर मंथन हुआ। हालांकि सिंधिया और नरोत्तम मिश्रा के बैठक में शामिल नहीं होने को लेकर अलग-अलग चर्चाएं सामने आई हैं। इससे पहले एक बैठक में नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि उन्हें बैठक की सूचना नहीं मिली थी, जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया की गैरमौजूदगी की भी पुष्टि हुई थी।

नरोत्तम की गैरमौजूदगी पर सवाल

कोर ग्रुप की सूची में नाम होने के बावजूद नरोत्तम मिश्रा का बैठक में नहीं पहुंचना खास तौर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। उनकी गैरमौजूदगी को लेकर राजनीतिक विश्लेषक भाजपा के भीतर बदलते संगठनात्मक समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि मिश्रा की ओर से पहले यह स्पष्ट किया गया था कि उन्हें बैठक की सूचना नहीं मिली थी।

सिंधिया भी बैठक से दूर

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बैठक में शामिल नहीं होना भी राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय है। हालिया रिपोर्टों में कोर कमेटी की बैठक में सिंधिया की अनुपस्थिति की पुष्टि हुई है।

शिवराज को लेकर भी सियासी चर्चा

बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी के बीच उनके नाराज नजर आने की चर्चाओं ने भी सियासी पारा बढ़ाया है। हालांकि उनकी नाराजगी को लेकर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में इसे फिलहाल राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चा के तौर पर ही देखा जा रहा है। लेकिन कहा जा रहा है पूर्व सीएम बैठक के स्थल को पार्टी कार्यालय में चाह रहे थे...

संगठन के भीतर क्या चल रहा है?

एक तरफ भाजपा संगठन में नए पदाधिकारियों और नई जिम्मेदारियों के बाद बदलाव का दौर जारी है, तो दूसरी तरफ वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी और गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर संभावित नए समीकरणों को लेकर अटकलों को हवा दी है। अब सवाल यही है कि क्या ये महज संयोग हैं या मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर संगठनात्मक स्तर पर कोई बड़ा बदलाव आकार ले रहा है।

Friday, July 3, 2026

हेमंत खंडेलवाल के एक साल का कार्यकाल कितनी मिसाल,कितने सवाल !

मध्य प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपना एक साल पूरा कर लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर उनका यह एक साल का कार्यकाल कैसा रहा? क्या वे संगठन को नई दिशा देने में सफल रहे या फिर उनके सामने अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं?
जब हेमंत खंडेलवाल को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपी गई थी, तब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने की थी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार काम कर रही थी, वहीं संगठन को भी नई ऊर्जा देने की जरूरत महसूस की जा रही थी।
अपने एक साल के कार्यकाल में हेमंत खंडेलवाल ने संगठनात्मक गतिविधियों पर विशेष जोर दिया। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं से संवाद, विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन और संगठन के विस्तार पर उनका फोकस दिखाई दिया। पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं के बीच सक्रियता बढ़ाने के प्रयास भी किए गए।


हेमंत खंडेलवाल ने भाजपा कार्यालय में सरकार के मंत्रियों के बैठने की व्यवस्था शुरू की 

हेमंत खंडेलवाल की कार्यकाल में ही क्षेत्रीय स्तर के राजनीतिक विवाद उलझे 

सागर ,रीवा ,ग्वालियर, चंबल गुना में नेताओं में आपस में समन्वय बड़ा 

हेमंत ने आते ही सबसे ज्यादा जोर अनुशासन पर दिया 

हेमंत खंडेलवाल ने कार्यकर्ताओं को पोस्टर राजनीति से दूर रहने की सलाह दी गई 

खंडेलवाल ने प्रदेश अध्यक्ष होने के साथ-साथ अपने क्षेत्र बैतूल पर भी पूरा फोकस किया 
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा ने इस दौरान अपने जनाधार को बनाए रखने और संगठन को मजबूत रखने की दिशा में काम किया। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर खंडेलवाल लगातार जिलों के दौरे करते रहे और स्थानीय इकाइयों के साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश की। इसका फायदा संगठनात्मक मजबूती के रूप में देखने को मिला।
हालांकि विपक्ष का आरोप रहा कि भाजपा सरकार और संगठन जनता के मुद्दों पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके। कांग्रेस ने बेरोजगारी, महंगाई, किसानों और स्थानीय समस्याओं को लेकर सरकार और संगठन दोनों को घेरने की कोशिश की। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में खंडेलवाल को राजनीतिक जवाबदेही और संगठनात्मक संतुलन दोनों संभालने पड़े।

हेमंत खंडेलवाल का पहला साल विवादों से अपेक्षाकृत दूर और संगठन केंद्रित रहा। उन्होंने आक्रामक बयानबाजी की बजाय संगठनात्मक मजबूती पर ज्यादा ध्यान दिया। यही वजह है कि भाजपा के भीतर उन्हें एक समन्वयकारी नेता के रूप में देखा जाने लगा है।लेकिन चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। आगामी चुनावों की तैयारियां, कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं, सरकार के प्रदर्शन को जनता तक पहुंचाना और विपक्ष के आरोपों का जवाब देना आने वाले समय में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

Saturday, June 6, 2026

**दिग्गजों को पछाड़कर रजनीश अग्रवाल बने राज्यसभा उम्मीदवार-इनसाइड स्टोरी

मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मध्य प्रदेश से रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया है। उनकी उम्मीदवारी इसलिए चर्चा में है क्योंकि पार्टी में कई बड़े और चर्चित नेताओं के नाम चल रहे थे, लेकिन संगठन में लंबे समय से काम कर रहे रजनीश अग्रवाल पर नेतृत्व ने भरोसा जताया। एमपी बीजेपी के कई दिग्गज राज्यसभा की दौड़ में थे,, इनमे कैलाश विजयवर्गीय ,नरोत्तम मिश्रा और अरविंद भदौरिया जैसे नाम शामिल थे,, बीजेपी इस बार सामान्य चेहरे को मौका देना चाहती थी,, हेमन्त खंडेलवाल ने इन नामो के साथ ही रजनीश अग्रवाल का नाम भी आगे बढ़ाया,, दिल्ली ने कैलाश विजयवर्गीय के नाम को साफ नकार दिया,, नरोत्तम दतिया से उपचुनाव लड़ना चाहते है ,, भदौरिया को लेकर अमित शाह राजी नही थे ,, ऐसे में चौथे नाम रजनीश अग्रवाल पर सहमति बनी ... रजनीश अग्रवाल सागर जिले के मंडी बामोरा क्षेत्र से आते हैं और भाजपा संगठन में बूथ प्रबंधन व चुनावी रणनीति के विशेषज्ञ माने जाते हैं। वे वर्तमान में मध्य प्रदेश भाजपा में प्रदेश मंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। पार्टी के भीतर उनकी पहचान एक ऐसे संगठनकर्ता की है जो वर्षों से पर्दे के पीछे रहकर चुनावी मशीनरी को मजबूत करते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उनकी उम्मीदवारी का एक बड़ा संदेश यह भी है कि भाजपा ने चुनावी राजनीति के बड़े चेहरों के बजाय संगठन में लगातार काम करने वाले कार्यकर्ता को प्राथमिकता दी है। साथ ही, बुंदेलखंड क्षेत्र को प्रतिनिधित्व देने की दृष्टि से भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वे भाजपा की ओर से बुंदेलखंड से राज्यसभा पहुंचने वाले पहले नेता बन सकते हैं। भाजपा ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए तरुण चुग और रजनीश अग्रवाल को उम्मीदवार बनाया है। जिन सीटों पर चुनाव हो रहा है, उनमें वर्तमान राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह की सीट भी शामिल है **मुख्य बिंदु:** * भाजपा ने रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया। * संगठन और बूथ प्रबंधन के विशेषज्ञ माने जाते हैं। * कई चर्चित दिग्गज नेताओं के बीच उन्हें टिकट मिला। * बुंदेलखंड को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का बड़ा संदेश। * सागर जिले से राज्यसभा पहुंचने वाले पहले नेता बनने की संभावना।