भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 जून को मध्यप्रदेश के दौरे पर आ सकते हैं। उनका नरसिंहपुर जिले के गाडरवाड़ा में प्रस्तावित कार्यक्रम होने की संभावना है, जहां वे एनटीपीसी सुपर थर्मल पावर स्टेशन की विस्तार परियोजना का भूमिपूजन कर सकते हैं। प्रधानमंत्री के संभावित दौरे को लेकर प्रशासनिक तैयारियां तेज हो गई हैं, हालांकि आधिकारिक कार्यक्रम अभी जारी नहीं हुआ है। जानकारी के मुताबिक, गाडरवाड़ा सुपर थर्मल पावर स्टेशन के विस्तार के तहत 1600 मेगावाट क्षमता की दो नई इकाइयां स्थापित की जाएंगी। यह परियोजना 2×800 मेगावाट क्षमता की होगी। इस विस्तार के बाद मध्यप्रदेश की बिजली उत्पादन क्षमता में बड़ा इजाफा होने की उम्मीद है। साथ ही प्रदेश की औद्योगिक और घरेलू बिजली जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी। बताया जा रहा है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना में आधुनिक अल्ट्रा सुपरक्रिटिकल तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे कम ईंधन में ज्यादा बिजली उत्पादन संभव हो सकेगा। इसके अलावा पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए एयर-कूल्ड कंडेंसर तकनीक का भी उपयोग किया जाएगा, जिससे पानी की खपत कम होगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर गाडरवाड़ा परियोजना के भूमिपूजन कार्यक्रम में शामिल होने का आग्रह किया था। मुख्यमंत्री ने इसे मध्यप्रदेश के ऊर्जा क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण परियोजना बताया था। गाडरवाड़ा पहले से ही प्रदेश के प्रमुख ऊर्जा केंद्रों में शामिल है। अब इस विस्तार परियोजना के जरिए न सिर्फ बिजली उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। निर्माण कार्य और परियोजना संचालन से हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना जताई जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित दौरे को लेकर बीजेपी और प्रशासनिक अमले में भी उत्साह का माहौल है। सुरक्षा व्यवस्था से लेकर कार्यक्रम स्थल की तैयारियों तक सभी व्यवस्थाओं पर तेजी से काम किया जा रहा है। माना जा रहा है कि यदि प्रधानमंत्री का दौरा तय होता है तो यह प्रदेश की ऊर्जा और औद्योगिक विकास योजनाओं के लिए बड़ा संदेश माना जाएगा।
Thursday, May 28, 2026
हेमंत खंडेलवाल की नितिन नबीन से मुलाकात ने बदले राज्यसभा के समीकरण !
Wednesday, May 27, 2026
सिंधिया समर्थकों की इस्तीफे की तैयारी
भोपाल। मध्य प्रदेश बीजेपी में निगम-मंडलों और प्राधिकरणों की नियुक्तियों के बाद अब अंदरूनी नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। सबसे ज्यादा चर्चा सिंधिया खेमे को लेकर हो रही है। पार्टी और सरकार में अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिलने से ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों में बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि कुछ नेता संगठन और पदों से इस्तीफे जैसी रणनीति पर भी विचार कर रहे हैं। दरअसल, मोहन यादव सरकार द्वारा लगातार राजनीतिक नियुक्तियां की जा रही हैं, लेकिन सिंधिया समर्थकों को अब तक सीमित जगह ही मिल पाई है। जबकि 2020 में सत्ता परिवर्तन के दौरान सिंधिया के साथ खड़े रहने वाले कई नेताओं को उम्मीद थी कि उन्हें सरकार और संगठन में अहम जिम्मेदारियां मिलेंगी।
2020 में सत्ता परिवर्तन के हीरो, अब इंतजार में समर्थक
ज्योतिरादित्य सिंधिया जब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए थे, तब उनके साथ कई विधायकों और नेताओं ने भी पार्टी बदली थी। उसी राजनीतिक घटनाक्रम ने कमलनाथ सरकार गिराई और बीजेपी को दोबारा सत्ता में पहुंचाया। उस दौर में सिंधिया समर्थकों का प्रभाव सरकार और संगठन दोनों में साफ दिखाई देता था। शिवराज सरकार में सिंधिया खेमे के नेताओं को मंत्री पद और संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिली थीं। लेकिन अब हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं। निगम-मंडलों की सूची में सिंधिया समर्थकों को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में असंतोष बढ़ रहा है।
कई बड़े चेहरे अब भी इंतजार में
सिंधिया खेमे के जिन नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद थी, वे अब भी इंतजार कर रहे हैं। इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसौदिया, गिर्राज दंडोतिया, रघुराज कंसाना, मुन्नालाल गोयल और रक्षा संतराम सरोनिया जैसे कई नेताओं को अब तक कोई अहम पद नहीं मिला है। अब तक हुई नियुक्तियों में सिंधिया समर्थकों में सिर्फ दो नाम—सुधीर गुप्ता और अशोक शर्मा—को ही जगह मिल पाई है। यही वजह है कि समर्थकों के बीच यह संदेश जा रहा है कि पार्टी में सिंधिया खेमे का प्रभाव पहले जैसा मजबूत नहीं रहा।
इस्तीफे की अटकलों ने बढ़ाई हलचल
बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो कुछ सिंधिया समर्थक नेता लगातार खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि यदि आने वाले समय में राजनीतिक संतुलन नहीं साधा गया तो कुछ नेता संगठनात्मक पदों या जिम्मेदारियों से इस्तीफा देकर दबाव की राजनीति अपना सकते हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर किसी नेता ने इस्तीफे की बात नहीं कही है, लेकिन अंदरखाने बढ़ती नाराजगी को बीजेपी नेतृत्व गंभीरता से देख रहा है।
विरोधियों को मिली जगह, बढ़ी नाराजगी
सिंधिया समर्थकों की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में सिंधिया के विरोधी माने जाने वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिली हैं। केपी यादव और रामनिवास रावत जैसे नेताओं को अहम पद मिलने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि पार्टी अब नए शक्ति संतुलन पर काम कर रही है।
बीजेपी का फोकस अब संगठन आधारित राजनीति पर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब प्रदेश में किसी एक नेता या गुट पर निर्भर रहने के बजाय संगठन आधारित राजनीति को मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश संगठन अपनी अलग कार्यशैली के साथ राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। फिलहाल, निगम-मंडलों की नियुक्तियों ने बीजेपी के भीतर सिंधिया खेमे की स्थिति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है। अब सभी की नजर आने वाले दिनों में होने वाली अगली राजनीतिक नियुक्तियों और संगठनात्मक फैसलों पर टिकी है, क्योंकि वही तय करेंगे कि बीजेपी में सिंधिया समर्थकों की नाराजगी शांत होती है या सियासी संकट और गहराता है।
योगमय हुआ खजुराहो, शुरू हुआ काउंटडाउन
खजुराहो। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के 25 दिवसीय काउंटडाउन के अवसर पर विश्व धरोहर नगरी खजुराहो में “योग महोत्सव 2026” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वर्चुअली संबोधित करते हुए योग और भारतीय संस्कृति के महत्व पर जोर दिया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि योग और खजुराहो, दोनों ही भारतीय संस्कृति के अभिन्न स्तंभ हैं। योग भारत की प्राचीन परंपरा और जीवन पद्धति का प्रतीक है, जबकि खजुराहो भारतीय कला, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत की पहचान है। उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संतुलन का माध्यम भी है। सीएम डॉ. यादव ने कहा कि राज्य सरकार योग को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़कर स्वस्थ, जागरूक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध समाज के निर्माण की दिशा में लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने लोगों से नियमित योग अपनाने और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने की अपील भी की। कार्यक्रम में योग साधकों, विद्यार्थियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। विश्व प्रसिद्ध खजुराहो की ऐतिहासिक धरोहरों के बीच आयोजित योग महोत्सव ने भारतीय संस्कृति और योग परंपरा की विशेष छाप छोड़ी। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 को लेकर प्रदेशभर में विभिन्न कार्यक्रमों और जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। खजुराहो में आयोजित यह योग महोत्सव उसी श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
Saturday, May 23, 2026
इस बार एमपी बीजेपी में राज्यसभा के लिए बड़ी सुगबुगाहट!
भोपाल। मध्यप्रदेश बीजेपी में राज्यसभा चुनाव को लेकर अंदरखाने हलचल तेज हो गई है। पार्टी भले अभी खुलकर कुछ नहीं कह रही, लेकिन भोपाल से लेकर दिल्ली तक बैठकों और नामों की चर्चाओं ने सियासी गलियारों का तापमान बढ़ा दिया है। इस बार बीजेपी सिर्फ सीट भरने नहीं, बल्कि बड़े सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। सूत्रों के मुताबिक मोहन सरकार के दो वरिष्ठ मंत्रियों के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। संगठन और सरकार में सक्रिय इन चेहरों को दिल्ली भेजने के विकल्प पर पार्टी मंथन कर रही है। हालांकि अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर होना है, लेकिन दावेदारों की सक्रियता लगातार बढ़ती नजर आ रही है। सबसे ज्यादा चर्चा आदिवासी प्रतिनिधित्व को लेकर है। मौजूदा राज्यसभा सांसद सुमेर सिंह सोलंकी एक बार फिर मौका पाने के लिए प्रयासरत बताए जा रहे हैं। लेकिन पार्टी के भीतर इस बार नए आदिवासी चेहरे को आगे लाने की भी चर्चा तेज है। बीजेपी आगामी चुनावों से पहले आदिवासी वोट बैंक को बड़ा संदेश देने की तैयारी में मानी जा रही है। वहीं केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन की सीट को लेकर भी सस्पेंस बना हुआ है। सूत्रों का दावा है कि पार्टी इस सीट पर फिर किसी बाहरी लेकिन राष्ट्रीय स्तर के चेहरे को मौका दे सकती है। यानी मध्यप्रदेश से राज्यसभा भेजकर राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण साधने की तैयारी भी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार बीजेपी में दावेदारों की संख्या ज्यादा और सीटें सीमित हैं। ऐसे में संगठन अनुभव, सामाजिक समीकरण और केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे — तीनों का संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि कई बड़े नेता इन दिनों दिल्ली और भोपाल के बीच ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। कुल मिलाकर बीजेपी में राज्यसभा को लेकर “साइलेंट पॉलिटिक्स” तेज हो चुकी है। अब नजर सिर्फ इस बात पर है कि पार्टी संगठन के भरोसेमंद चेहरों पर दांव लगाएगी या फिर किसी नए नाम से सबको चौंकाएगी।
राज्यसभा के लिए "नाथ के साथ" दिल्ली
भोपाल। मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच कांग्रेस की इकलौती सीट पर सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी नाम की है, तो वो है पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ। पार्टी के भीतर भले कई चेहरे दावेदारी कर रहे हों, लेकिन सियासी गलियारों में सबसे मजबूत पकड़ अब भी “नाथ परिवार” की मानी जा रही है। यही वजह है कि राज्यसभा की इस एक सीट को लेकर कांग्रेस में अंदरखाने मंथन तेज हो गया है। 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के खाते में एक सीट आना लगभग तय माना जा रहा है। लेकिन इस सीट पर उम्मीदवार कौन होगा, यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है। सूत्रों की मानें तो क्रॉस वोटिंग के डर और संगठनात्मक पकड़ को देखते हुए पार्टी का एक बड़ा वर्ग कमलनाथ के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश में जुटा है। दरअसल, कमलनाथ सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि प्रदेश कांग्रेस में सबसे मजबूत राजनीतिक नेटवर्क रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। विधायकों पर पकड़, संसाधन जुटाने की क्षमता और दिल्ली दरबार तक सीधी पहुंच उन्हें बाकी दावेदारों से अलग खड़ा करती है। यही वजह है कि जब भी कांग्रेस मुश्किल में होती है, नजरें फिर “नाथ फैक्टर” पर टिक जाती हैं। सियासी चर्चा यह भी है कि अगर कमलनाथ राज्यसभा जाते हैं, तो छिंदवाड़ा से लेकर भोपाल तक कांग्रेस की राजनीति में बड़ा संदेश जाएगा। पार्टी के भीतर इसे “अनुभव बनाम प्रयोग” की लड़ाई के तौर पर भी देखा जा रहा है। राहुल गांधी की नई टीम युवा चेहरों को आगे बढ़ाना चाहती है, लेकिन मध्यप्रदेश में संगठन की जमीनी हकीकत अब भी कमलनाथ के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। हालांकि दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, जीतू पटवारी और कमलेश्वर पटेल जैसे नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं, लेकिन पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि इस समय कांग्रेस किसी “रिस्क” के मूड में नहीं दिख रही। यही कारण है कि कमलनाथ का नाम लगातार सबसे ऊपर चल रहा है। दिलचस्प बात यह भी है कि पिछले कुछ महीनों में कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ की राजनीतिक सक्रियता फिर बढ़ी है। दिल्ली से लेकर छिंदवाड़ा तक लगातार बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं ने यह संकेत दिए हैं कि “नाथ परिवार” अभी भी प्रदेश कांग्रेस की धुरी बना हुआ है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या कांग्रेस हाईकमान एक बार फिर मध्यप्रदेश में कमलनाथ पर भरोसा जताएगा? या फिर पार्टी किसी नए चेहरे पर दांव लगाकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करेगी? फिलहाल कांग्रेस की इस एक सीट ने पूरे प्रदेश की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है।





