भोपाल। मध्यप्रदेश भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति को लेकर संगठन के भीतर हलचल तेज हो गई है। पार्टी ने भले ही कार्यसमिति की पहली बैठक के आयोजन स्थल के तौर पर ओरछा का नाम तय कर दिया हो, लेकिन अब तक नई कार्यसमिति के सदस्यों के नामों पर अंतिम सहमति नहीं बन पाई है। ऐसे में कार्यसमिति गठन और बैठक दोनों को लेकर संगठन के भीतर लगातार मंथन चल रहा है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि नई प्रदेश कार्यसमिति की पहली बैठक ओरछा में राम राजा सरकार के दरबार में आयोजित की जाएगी। लेकिन बैठक से पहले संगठनात्मक संतुलन साधना पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस बार भाजपा प्रदेश नेतृत्व कार्यसमिति का आकार सीमित रखने के पक्ष में है। पार्टी संविधान के प्रावधानों के तहत प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल कार्यसमिति को छोटी और प्रभावी टीम के रूप में तैयार करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि प्रदेश कार्यसमिति में कुल सदस्यों की संख्या करीब 106 तक सीमित रखने की तैयारी है, जबकि विशेष आमंत्रित सदस्यों की संख्या भी 30 प्रतिशत से ज्यादा न हो, इस पर जोर दिया जा रहा है। इसी के तहत लगभग 32 विशेष आमंत्रित सदस्यों तक सीमित रखने पर चर्चा चल रही है। हालांकि, छोटे आकार की कार्यसमिति बनाने की कोशिश ने संगठन के भीतर समीकरणों को और जटिल बना दिया है। नए और पुराने नेताओं के बीच संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने में पार्टी नेतृत्व को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। कई नेता अपने समर्थकों को कार्यसमिति में जगह दिलाने के लिए सक्रिय बताए जा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कार्यसमिति गठन में हो रही देरी इसी अंदरूनी खींचतान और सीमित जगह के कारण है। फिलहाल स्थिति यह है कि बैठक का स्थान तय हो चुका है, लेकिन कार्यसमिति के चेहरे अब भी तय नहीं हो पाए हैं। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि भाजपा नेतृत्व कब नई प्रदेश कार्यसमिति का औपचारिक ऐलान करता है।
Saturday, May 9, 2026
भोपाल और इंदौर विकास प्राधिकरण दिग्गजों की लड़ाई में अटके
भोपाल। मध्यप्रदेश में निगम-मंडलों की नियुक्तियों का दौर जारी है, लेकिन बड़े शहरों के विकास प्राधिकरणों में नियुक्तियां अब भी अटकी हुई हैं। ग्वालियर और जबलपुर विकास प्राधिकरण में नियुक्तियों के बाद अब सबसे ज्यादा चर्चा भोपाल और इंदौर विकास प्राधिकरण को लेकर हो रही है, जहां दिग्गज नेताओं के बीच खींचतान खुलकर सामने आती दिख रही है। सूत्रों के मुताबिक, भोपाल विकास प्राधिकरण के लिए कई बड़े नेताओं ने अपने-अपने समर्थकों के नाम आगे बढ़ाए हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खेमे के नेताओं के नाम प्रमुख बताए जा रहे हैं। हालांकि, जिस नाम पर लगभग सहमति बनती नजर आई, उसका स्थानीय मंत्रियों विश्वास सारंग और कृष्णा गौर द्वारा विरोध किए जाने की चर्चा है। यही वजह है कि अब तक भोपाल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के नाम पर अंतिम मुहर नहीं लग पाई है। उधर इंदौर में भी हालात अलग नहीं हैं। यहां मंत्री कैलाश विजयवर्गीय समर्थक और मुख्यमंत्री खेमे के नेताओं के बीच पद को लेकर अंदरूनी टकराव की चर्चा तेज है। देवास में भी इसी तरह के समीकरण बनने की बात सामने आ रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा में आमतौर पर नियुक्तियों को लेकर खुला टकराव कम दिखाई देता था, लेकिन इस बार हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं। लंबे समय बाद भी भोपाल और इंदौर जैसे बड़े विकास प्राधिकरणों के लिए नाम तय न होना इसी ओर इशारा कर रहा है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने भी भाजपा पर तंज कसा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भाजपा में अब “एक अनार सौ बीमार” जैसे हालात बन गए हैं और पदों के लिए अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ रही है। हालांकि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने दावा किया है कि भोपाल और इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्षों के नाम जल्द घोषित कर दिए जाएंगे। लेकिन फिलहाल पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और दिग्गजों के बीच शक्ति संतुलन की राजनीति अलग ही कहानी बयां कर रही है।
Thursday, May 7, 2026
एक्शन मोड में सीएम डॉ. मोहन यादव, एमपी के अफसरों की लेंगे क्लास
भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार अब प्रशासनिक कामकाज को लेकर बड़े स्तर पर समीक्षा की तैयारी में जुट गई है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव 15 मई के बाद विभागवार हाई लेवल समीक्षा बैठकें करेंगे। पहले यह बैठक 6 मई के आसपास प्रस्तावित थी, लेकिन अब इसे आगे बढ़ाकर 15 मई के बाद आयोजित करने की तैयारी की गई है। सूत्रों के मुताबिक यह सिर्फ सामान्य समीक्षा बैठक नहीं होगी, बल्कि जनता से जुड़े 45 बड़े मुद्दों, लंबित योजनाओं और नीतिगत फैसलों को लेकर विस्तृत कार्ययोजना बनाई जाएगी। मुख्यमंत्री चुनिंदा विभागों के साथ अलग-अलग बैठक कर अगले एक साल के लक्ष्य तय करेंगे और काम की समय सीमा भी निर्धारित की जाएगी। सरकार का फोकस सिर्फ योजनाओं की प्रगति पर नहीं, बल्कि नीतियों में बदलाव, प्रशासनिक सुधार और दूरगामी फैसलों पर रहेगा। बताया जा रहा है कि किन विभागों के साथ किन विषयों पर चर्चा होगी, इसके लिए अलग से विस्तृत शेड्यूल तैयार किया गया है। बैठकों में आम जनता से जुड़े मुद्दों—जैसे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, निवेश, कृषि और शहरी विकास—को प्राथमिकता दी जाएगी। मुख्यमंत्री विभागों से ग्राउंड रिपोर्ट भी मांग सकते हैं, ताकि योजनाओं के असर और कमियों की समीक्षा की जा सके। सरकारी सूत्रों का कहना है कि मोहन सरकार अगले एक साल के लिए प्रशासनिक रोडमैप तैयार करने की दिशा में काम कर रही है और यही वजह है कि इस समीक्षा प्रक्रिया को बेहद अहम माना जा रहा है।
रामनिवास रावत पर भरोसा, सिंधिया खेमे को बड़ा सियासी संदेश
भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों रामनिवास रावत सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए पूर्व मंत्री रामनिवास रावत को वन विकास निगम का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद सियासी हलकों में नए समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है। खास बात यह है कि रावत को यह जिम्मेदारी ऐसे समय मिली है, जब पार्टी के भीतर इसे लेकर विरोध की बातें भी सामने आती रही हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे की नाराजगी के बावजूद संगठन और सरकार ने रामनिवास रावत पर भरोसा जताया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार अलग-अलग मंचों से उनकी तारीफ करते नजर आ रहे हैं। इतना ही नहीं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने भी खुलकर उनका समर्थन किया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा संगठन ने रामनिवास रावत को आगे कर एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी में शामिल होने वाले नेताओं को सिर्फ जगह ही नहीं, बल्कि राजनीतिक महत्व भी दिया जाएगा। यही वजह है कि मुख्यमंत्री के भाषणों में भी रावत का जिक्र प्रमुखता से देखने को मिल रहा है।
उधर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में सांसद भरत सिंह यादव और रामनिवास रावत की बढ़ती नजदीकियां भी चर्चा में हैं। दोनों नेताओं की जोड़ी को क्षेत्रीय राजनीति में नए समीकरण के तौर पर देखा जा रहा है।
इसी बीच निगम-मंडलों की नियुक्तियों में सिंधिया समर्थकों को अपेक्षित जगह न मिलने की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में गर्म है। कई नेता अब तक शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात तक नहीं कर पाए हैं, जबकि रामनिवास रावत जैसे नेताओं को लगातार राजनीतिक महत्व मिलता दिख रहा है।
कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश में चल रही निगम-मंडल नियुक्तियों के बीच रामनिवास रावत का उभरता कद भाजपा की अंदरूनी राजनीति और बदलते शक्ति संतुलन की नई कहानी लिखता नजर आ रहा है।
Wednesday, May 6, 2026
एमपी में नेताओं पर हावी अफसरशाही, केंद्र ने पत्र लिख दिया सबूत
भोपाल। मध्यप्रदेश में अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ते टकराव का मामला अब केंद्र सरकार तक पहुंच गया है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए मुख्य सचिव को पत्र लिखकर अधिकारियों को व्यवहार और प्रक्रिया का पालन कराने के निर्देश दिए हैं। केंद्र की ओर से जारी ऑफिस मेमोरेंडम में साफ कहा गया है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच आधिकारिक कामकाज में शिष्टाचार और निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। DoPT ने सभी मंत्रालयों, विभागों और राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा है कि वे इस संबंध में जारी दिशा-निर्देशों को राज्य, संभाग और जिला स्तर तक लागू कराएं। डिप्टी सेक्रेटरी स्तर से जारी इस पत्र में खास तौर पर जोर दिया गया है कि अधिकारी जनप्रतिनिधियों के पत्रों और संवाद का विनम्रता से जवाब दें। साथ ही यह भी कहा गया है कि सांसदों और विधायकों के साथ व्यवहार में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना जरूरी है। सूत्रों के मुताबिक, हाल के दिनों में मध्यप्रदेश में अफसरों और नेताओं के बीच विवादों के कई मामले सामने आए थे, जिसके बाद यह मामला केंद्र तक पहुंचा। ऐसे में DoPT की यह चिट्ठी एक तरह से प्रशासनिक अनुशासन और राजनीतिक समन्वय बनाए रखने का स्पष्ट संदेश मानी जा रही है। कुल मिलाकर, केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि प्रशासनिक तंत्र और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव की स्थिति से बचते हुए मर्यादित और जवाबदेह कार्यशैली अपनाना जरूरी है। केंद्र ने कहा है कि अधिकारियों को तय प्रोटोकॉल का पालन हर हाल में करना होगा। सरकार ने चेतावनी दी है कि जनप्रतिनिधियों के पत्रों का समय पर और विनम्र जवाब देना अनिवार्य है। बार-बार आ रही शिकायतों को केंद्र ने गंभीर संकेत मानते हुए राज्य सरकार से जवाब भी मांगा है।
बंगाल चुनाव के बाद बिहार के पप्पू यादव " मां बगुलामुखी की शरण में"
भोपाल। पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद देश की राजनीति में हलचल के बीच सांसद पप्पू यादव का मध्यप्रदेश दौरा सुर्खियों में आ गया है। पप्पू यादव पहले दतिया स्थित प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर देश और प्रदेश की खुशहाली की कामना की। इसके बाद वे नलखेड़ा भी पहुंचे, जहां मां बगलामुखी के दरबार में उन्होंने मत्था टेका। मंदिर में दर्शन के दौरान उनके समर्थकों की भी मौजूदगी रही, जिससे यह साफ संकेत मिला कि यह दौरा सिर्फ निजी आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। चुनावी नतीजों के बाद जब सभी दल अपनी रणनीतियों को नए सिरे से साधने में जुटे हैं, ऐसे समय में पप्पू यादव का यह धार्मिक दौरा खासा अहम माना जा रहा है।नलखेड़ा पहुंचकर पप्पू यादव ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि “चुनाव आयोग और SIR ने चुनाव जिताया है, अब मां ही चमत्कार करेंगी।” उनके इस बयान को सीधे तौर पर चुनाव नतीजों पर टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, मां बगलामुखी का दरबार शक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में यहां पहुंचना एक तरह से राजनीतिक आत्मविश्वास और नई रणनीति का संकेत भी है। चुनाव के बाद धार्मिक स्थलों का दौरा अक्सर जनता से भावनात्मक जुड़ाव मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जाता है। साथ ही, मध्यप्रदेश में सक्रियता बढ़ाकर पप्पू यादव अपने संगठनात्मक आधार को मजबूत करने और समर्थकों से सीधा संपर्क साधने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। यह दौरा एक “सॉफ्ट पॉलिटिकल मैसेज” भी देता है, जहां आस्था के जरिए जनता के बीच भरोसा और जुड़ाव बनाने का प्रयास साफ दिखता है। कुल मिलाकर, पप्पू यादव का यह दौरा केवल श्रद्धा तक सीमित नहीं है, बल्कि सियासी टाइमिंग, बयान और संदेश—तीनों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। मंदिर की सीढ़ियों से राजनीति के नए समीकरणों की आहट भी साफ सुनाई दे रही है।








