भोपाल। मध्यप्रदेश में सियासत इन दिनों खुले मंच से ज्यादा बंद कमरों में तय होती दिख रही है। जून में होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए कागजों पर भले ही गणित साफ नजर आता हो—दो सीटें बीजेपी और एक कांग्रेस के खाते में—लेकिन असल खेल अब इस तय समीकरण को पलटने का है। बीजेपी ने तीसरी सीट पर कब्जे के लिए अंदरखाने ‘ऑपरेशन पॉलिटिक्स’ शुरू कर दिया है। विधानसभा की मौजूदा स्थिति इस पूरी रणनीति की कुंजी है। एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 58 विधायकों की जरूरत होती है। बीजेपी के पास इस समय 164 विधायक हैं, यानी दो सीटें जीतने में उसे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन तीसरी सीट के लिए आंकड़ा करीब 174 तक पहुंचता है, जहां बीजेपी को 10 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ती है। यहीं से खेल दिलचस्प और पेचीदा बनता है। कांग्रेस की स्थिति पहले ही कमजोर होती नजर आ रही है। उसके पास 64 विधायक थे, लेकिन विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा पर कोर्ट द्वारा मतदान पर रोक लगने के बाद संख्या घटकर 63 रह गई है। वहीं बीना से विधायक निर्मला सप्रे का रुख पहले से ही बीजेपी की ओर झुका हुआ माना जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस का आंकड़ा कागजों पर जितना दिखता है, जमीन पर उतना मजबूत नहीं माना जा रहा। यही वजह है कि बीजेपी अब ‘क्रॉस वोटिंग’ और ‘मैनेजमेंट’ के जरिए तीसरी सीट का गणित साधने में जुटी है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि अगर 4 से 5 विधायकों को अपने पक्ष में किया जा सके या वोटिंग के दौरान क्रॉस वोटिंग हो जाए, तो तीसरी सीट भी हासिल की जा सकती है। इस पूरे खेल में किसी भी तरह की खुली बयानबाजी से बचते हुए रणनीति को पर्दे के पीछे ही रखा जा रहा है। दिलचस्प यह भी है कि हाल के घटनाक्रम—जैसे विजयपुर के बाद दतिया विधायक राजेंद्र भारती की विधायकी जाना—को भी इसी बड़े सियासी समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। भले ही कोई दल खुलकर इसे स्वीकार नहीं कर रहा, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे ‘समीकरण सेट करने’ की प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि बीजेपी की नजर खास तौर पर मध्यप्रदेश के मध्य क्षेत्र और ग्वालियर-चंबल बेल्ट के कुछ विधायकों पर है। इसके अलावा जिन विधायकों के कानूनी मामले लंबित हैं, उन्हें भी साधने की कोशिशें जारी हैं। यानी यह लड़ाई सिर्फ संख्या की नहीं, बल्कि प्रभाव, दबाव और मौके की भी है। उधर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखना है। पार्टी अंदरखाने सतर्क जरूर है, लेकिन फिलहाल डिफेंसिव मोड में नजर आ रही है। अगर कांग्रेस ने समय रहते मजबूत रणनीति और प्रभावशाली उम्मीदवार नहीं उतारा, तो यह खतरा भी बन सकता है कि उसके हिस्से की एकमात्र सीट भी खतरे में पड़ जाए। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश में सियासत अब सीधी रेखा में नहीं चल रही, बल्कि हर कदम पर मोड़ ले रही है। कागजों का गणित कुछ और कहता है, जबकि जमीन पर चल रहा ‘ऑपरेशन पॉलिटिक्स’ कुछ और कहानी लिखने की तैयारी में है। अब नजर इस बात पर है कि कौन अपने पाले को बचा पाता है और कौन दूसरे के मैदान में सेंध लगा देता है।
Saturday, April 4, 2026
कांग्रेस vs बीजेपी: एक विधायक पर अटका पूरा गणित
भोपाल। मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी तापमान तेजी से बढ़ रहा है और इस बार पूरी नजर एक ही नाम पर टिक गई है—निर्मला सप्रे। यह चुनाव सिर्फ सीटों का गणित नहीं, बल्कि निष्ठा और रणनीति की परीक्षा बनता जा रहा है। कांग्रेस खेमे में इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि निर्मला सप्रे का वोट आखिर किस ओर जाएगा। सियासी गलियारों में यह सवाल तैर रहा है कि वह कांग्रेस के साथ खड़ी रहेंगी या फिर बीजेपी के पक्ष में झुकाव दिखाएंगी। यही एक वोट पूरे चुनाव की दिशा बदल सकता है। दरअसल, राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की आशंका हमेशा बनी रहती है, लेकिन इस बार कांग्रेस ने पहले से ही अपनी रणनीति को ज्यादा सतर्क और कानूनी आधार पर मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अगर वोटिंग में कोई ‘खेल’ होता है, तो उसे सीधे कोर्ट तक ले जाने की तैयारी है। यही वजह है कि कांग्रेस चाहती है कि वोटिंग के बाद स्थिति पूरी तरह साफ हो और यह सामने आए कि निर्मला सप्रे ने आखिर किसे वोट दिया। हालांकि राज्यसभा चुनाव में वोटिंग गोपनीय होती है, लेकिन पार्टी के भीतर इसे लेकर दबाव और निगरानी दोनों बढ़ा दी गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव अब ‘नंबर गेम’ से ज्यादा ‘नर्व गेम’ बन गया है, जहां हर विधायक की वफादारी परख में है। खासतौर पर निर्मला सप्रे का नाम इसलिए चर्चा में है क्योंकि उनका रुख आखिरी वक्त तक सस्पेंस बनाए हुए है। उधर बीजेपी भी पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है और कोशिश में है कि कोई भी मौका हाथ से न जाने पाए। कुल मिलाकर, राज्यसभा चुनाव अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां एक वोट न सिर्फ नतीजा बदल सकता है, बल्कि सियासी रिश्तों की असली तस्वीर भी सामने ला सकता है। आने वाले वक्त में यह साफ हो जाएगा कि निर्मला सप्रे किस पाले में खड़ी हैं, लेकिन फिलहाल मध्यप्रदेश की राजनीति में यह ‘एक वोट’ सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।
एमपी के किसानों को राहत, गेहूं खरीदी से पहले बारदाने की कमी दूर
भोपाल। मध्यप्रदेश के किसानों के लिए गेहूं उपार्जन को लेकर बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी शुरू होने से पहले बारदाने (बोरी) की कमी की समस्या को दूर कर लिया गया है, जिससे किसानों को अब अपनी उपज बेचने में परेशानी नहीं होगी। राज्य के अलग-अलग संभागों में गेहूं खरीदी की तारीखें भी तय कर दी गई हैं। इंदौर, उज्जैन, भोपाल और नर्मदापुरम संभाग में 10 अप्रैल से समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी शुरू होगी, जबकि बाकी संभागों में यह प्रक्रिया 15 अप्रैल से शुरू की जाएगी।दरअसल, इस बार खरीदी से पहले बारदाने की कमी बड़ी समस्या बन रही थी। इसे देखते हुए भारत सरकार ने मध्यप्रदेश को अतिरिक्त राहत देते हुए 50 हजार जूट की गठानों का आवंटन जारी किया है। इससे खरीदी केंद्रों पर बोरी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी और किसानों को अपनी फसल बेचने में दिक्कत नहीं आएगी। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने एक और अहम निर्णय लेते हुए गेहूं उपार्जन के लिए HDP/PP बैग के उपयोग की अनुमति भी दे दी है। यानी अब जूट की बोरी के साथ-साथ प्लास्टिक बैग का भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे बारदाने की कमी की समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। सरकार के इस फैसले से लाखों किसानों को सीधा फायदा मिलेगा, क्योंकि अब उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए इंतजार या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। समय पर खरीदी शुरू होने से किसानों को समर्थन मूल्य का लाभ भी आसानी से मिल सकेगा। कुल मिलाकर, गेहूं खरीदी से पहले बारदाने की समस्या का समाधान होने से प्रदेश के किसानों के लिए यह राहत भरी खबर मानी जा रही है।
Friday, April 3, 2026
मध्यप्रदेश में आधी रात खुली विधानसभा, मचा बवाल
भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में गुरुवार देर रात उस समय हलचल मच गई जब अचानक विधानसभा सचिवालय खोला गया और देर रात ही एक अहम आदेश जारी कर दिया गया। इस कार्रवाई के बाद सियासी माहौल गरमा गया और विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। दरअसल, दतिया विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने सहकारी बैंक घोटाले के मामले में तीन साल की सजा और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। यह फैसला 2 अप्रैल 2026 को आया। कोर्ट से सजा मिलने के बाद कानून के तहत उनकी विधायकी स्वतः समाप्त हो गई, जिसके चलते विधानसभा सचिवालय ने तत्काल कार्रवाई करते हुए देर रात आदेश जारी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के 2013 के लिली थॉमस फैसले के अनुसार, यदि किसी विधायक या सांसद को दो साल या उससे अधिक की सजा होती है, तो उसकी सदस्यता तुरंत खत्म हो जाती है। इसी नियम के तहत राजेंद्र भारती की सदस्यता 2 अप्रैल 2026 से ही समाप्त मानी गई है। आदेश जारी होते ही दतिया विधानसभा सीट खाली हो गई है और अब यहां उपचुनाव की स्थिति बन गई है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि विधानसभा सचिवालय को आधी रात में खोलकर इतनी तेजी से कार्रवाई क्यों की गई। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाते हुए सरकार पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि इस तरह की जल्दबाजी कई सवाल खड़े करती है। वहीं सरकार का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार की गई है और इसमें किसी तरह की देरी नहीं की जा सकती थी। इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल और तेज हो गई है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी और बढ़ने के आसार हैं।
MP में शिक्षकों के वेतन पर सस्पेंस: सवा लाख में किसका बढ़ेगा पैसा?
भोपाल। मध्यप्रदेश में सवा लाख शिक्षकों के वेतन को लेकर इन दिनों भ्रम की स्थिति बनी हुई है। कई जगह यह चर्चा है कि शिक्षकों का वेतन नहीं बढ़ेगा, जबकि असल तस्वीर इससे थोड़ी अलग है। सरकार के फैसले और उसकी शर्तों को ठीक से समझना जरूरी है।
क्या है पूरा मामला?
राज्य सरकार ने शिक्षकों के लिए वेतन बढ़ोतरी का प्रावधान किया है, लेकिन यह फायदा सभी को एक साथ नहीं मिलने वाला। यही वजह है कि “वेतन नहीं बढ़ेगा” जैसी बातें सामने आ रही हैं।
किन शिक्षकों को मिलेगा फायदा?
सरकार का फैसला मुख्य रूप से उन शिक्षकों के लिए है जिन्होंने लंबी सेवा पूरी कर ली है। खास तौर पर:
30 से 35 साल या उससे अधिक सेवा पूरी करने वाले शिक्षक
पदोन्नति या क्रमोन्नति के पात्र शिक्षक
ऐसे शिक्षकों को उच्च वेतनमान का लाभ मिलेगा, जिससे उनकी सैलरी में हर महीने बढ़ोतरी होगी।
बाकी शिक्षक क्यों रह गए बाहर?
जो शिक्षक अभी इस सेवा अवधि तक नहीं पहुंचे हैं या जिनके केस लंबित हैं, उन्हें फिलहाल इस बढ़ोतरी का फायदा नहीं मिलेगा।
इसी वजह से बड़ी संख्या में शिक्षक इस फैसले से बाहर दिखाई दे रहे हैं।
कितना बढ़ सकता है वेतन?
पात्र शिक्षकों की सैलरी में हर महीने कुछ हजार रुपये तक का इजाफा हो सकता है। हालांकि यह बढ़ोतरी पद, सेवा अवधि और वेतनमान के हिसाब से अलग-अलग होगी।
सरकार क्या कर रही है?
सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि जिन शिक्षकों के वेतन या पदोन्नति से जुड़े मामले अटके हुए हैं, उन्हें सुलझाने की प्रक्रिया जारी है। इसके लिए विभागीय स्तर पर काम चल रहा है।
क्यों बना भ्रम?
सभी शिक्षकों को एक साथ लाभ नहीं मिला
नियम और पात्रता स्पष्ट नहीं होने से गलतफहमी फैली
सोशल मीडिया पर अधूरी जानकारी तेजी से वायरल हुई





