Friday, May 29, 2026

किसानों की मेहनत रंग लाई, गेहूं उपार्जन में MP अव्वल

भोपाल। मध्यप्रदेश ने इस साल गेहूं उपार्जन में नया रिकॉर्ड बनाते हुए देशभर में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। प्रदेश में समर्थन मूल्य पर बड़े पैमाने पर गेहूं खरीदी होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किसानों को बधाई दी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों की मेहनत और सरकार की योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के कारण मध्यप्रदेश लगातार कृषि क्षेत्र में नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रदेश सरकार लगातार किसान हित में फैसले ले रही है। सरकार का फोकस सिर्फ समर्थन मूल्य पर खरीदी तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों को समय पर भुगतान, बेहतर व्यवस्थाएं और कृषि को लाभ का धंधा बनाने पर भी काम किया जा रहा है। प्रदेश में इस बार गेहूं खरीदी ने नया रिकॉर्ड बनाया है। सरकार के मुताबिक लाखों किसानों से समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदा गया है और भुगतान की प्रक्रिया भी तेजी से पूरी की जा रही है। गेहूं उपार्जन केंद्रों पर किसानों के लिए पेयजल, छाया, हेल्प डेस्क और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश पहले ही दिए गए थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश अब देश के प्रमुख कृषि राज्यों में अपनी अलग पहचान बना चुका है। सरकार लगातार सिंचाई, भंडारण, आधुनिक तकनीक और समर्थन मूल्य व्यवस्था को मजबूत करने पर काम कर रही है, ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम मिल सके। सरकार ने इस बार छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता देते हुए खरीदी व्यवस्था को आसान बनाने पर विशेष जोर दिया। प्रदेशभर में हजारों उपार्जन केंद्र बनाए गए और स्लॉट बुकिंग से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम से जोड़ा गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि किसान प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और उनकी समृद्धि ही राज्य के विकास की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भी किसान कल्याण और कृषि विकास से जुड़े फैसले लगातार लिए जाते रहेंगे।




एमपी बीजेपी में बड़ा मंथन, राज्यसभा के लिए किन नामों पर चल रही चर्चा?


भोपाल। मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर बीजेपी के भीतर हलचल तेज है। नेताओं के नाम दिल्ली पहुंच चुके हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम को लेकर हो रही है, वह है कैलाश विजयवर्गीय। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि वे राज्यसभा जाएंगे या नहीं... बल्कि यह भी कि क्या बीजेपी अब प्रदेश की राजनीति में नए शक्ति संतुलन की पटकथा लिख रही है? सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी की ओर से केंद्रीय नेतृत्व को भेजी गई संभावित नामों की सूची में कैलाश विजयवर्गीय, डॉ. नरोत्तम मिश्रा, विनोद भदौरिया, अखंड प्रताप सिंह, लालसिंह आर्य, रंजना बघेल, डामोर और संघ पृष्ठभूमि से जुड़े अभय महाजन के नाम शामिल हैं। लेकिन इन सबके बीच सबसे दिलचस्प चर्चा विजयवर्गीय को लेकर है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो यदि कैलाश विजयवर्गीय को राज्यसभा भेजा जाता है, तो यह सिर्फ एक संसदीय नियुक्ति नहीं होगी, बल्कि मध्यप्रदेश बीजेपी की अंदरूनी राजनीति में बड़ा संकेत भी माना जाएगा। माना जा रहा है कि इससे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और कैलाश विजयवर्गीय के बीच लंबे समय से चल रहे सियासी मनमुटाव और शक्ति संतुलन की चर्चा भी शांत हो सकती है। दरअसल, मोहन सरकार बनने के बाद से ही सत्ता और संगठन के भीतर दो अलग-अलग पावर सेंटर की चर्चा लगातार होती रही है। कैलाश विजयवर्गीय संगठन और केंद्रीय नेतृत्व में मजबूत पकड़ रखने वाले नेता माने जाते हैं, जबकि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपनी अलग कार्यशैली और टीम के साथ सरकार चला रहे हैं। कई राजनीतिक फैसलों और नियुक्तियों को लेकर दोनों खेमों के बीच अंदरखाने असहजता की खबरें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में यदि विजयवर्गीय को राज्यसभा भेजा जाता है, तो इसे बीजेपी की “वन एरो, मल्टीपल टारगेट” रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। एक तरफ केंद्र में अनुभवी चेहरा मिलेगा, दूसरी ओर प्रदेश कैबिनेट में बदलाव का रास्ता भी आसान हो जाएगा। राजनीतिक गलियारों में तो यहां तक चर्चा है कि विजयवर्गीय की राज्यसभा एंट्री, मोहन कैबिनेट से उनकी विदाई का रास्ता भी बन सकती है। उधर, नरोत्तम मिश्रा का नाम भी लगातार चर्चा में बना हुआ है। बीजेपी के एक बड़े ब्राह्मण चेहरे के रूप में उनकी वापसी की संभावनाओं को भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है। वहीं आदिवासी समीकरण साधने के लिए रंजना बघेल और डामोर के नामों पर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है।सबसे चौंकाने वाली एंट्री संघ पृष्ठभूमि से जुड़े अभय महाजन की मानी जा रही है। अचानक उनका नाम सामने आने के बाद कई नेताओं की राजनीतिक गणित बदलती दिखाई दे रही है। इससे यह भी संकेत मिल रहे हैं कि बीजेपी संगठन और संघ के संतुलन को भी साधने की कोशिश में है। फिलहाल, राज्यसभा की एक सीट ने बीजेपी के भीतर कई समीकरणों को गर्म कर दिया है। अब नजर दिल्ली पर टिकी है, क्योंकि अंतिम फैसला वहीं से होना है। लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि इस बार राज्यसभा सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश बीजेपी के भविष्य के सत्ता संतुलन का ट्रेलर साबित हो सकता है।

Thursday, May 28, 2026

प्रधानमंत्री मोदी का संभावित MP दौरा, ऊर्जा हब की देंगे सौगात



भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 जून को मध्यप्रदेश के दौरे पर आ सकते हैं। उनका नरसिंहपुर जिले के गाडरवाड़ा में प्रस्तावित कार्यक्रम होने की संभावना है, जहां वे एनटीपीसी सुपर थर्मल पावर स्टेशन की विस्तार परियोजना का भूमिपूजन कर सकते हैं। प्रधानमंत्री के संभावित दौरे को लेकर प्रशासनिक तैयारियां तेज हो गई हैं, हालांकि आधिकारिक कार्यक्रम अभी जारी नहीं हुआ है। जानकारी के मुताबिक, गाडरवाड़ा सुपर थर्मल पावर स्टेशन के विस्तार के तहत 1600 मेगावाट क्षमता की दो नई इकाइयां स्थापित की जाएंगी। यह परियोजना 2×800 मेगावाट क्षमता की होगी। इस विस्तार के बाद मध्यप्रदेश की बिजली उत्पादन क्षमता में बड़ा इजाफा होने की उम्मीद है। साथ ही प्रदेश की औद्योगिक और घरेलू बिजली जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी। बताया जा रहा है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना में आधुनिक अल्ट्रा सुपरक्रिटिकल तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे कम ईंधन में ज्यादा बिजली उत्पादन संभव हो सकेगा। इसके अलावा पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए एयर-कूल्ड कंडेंसर तकनीक का भी उपयोग किया जाएगा, जिससे पानी की खपत कम होगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर गाडरवाड़ा परियोजना के भूमिपूजन कार्यक्रम में शामिल होने का आग्रह किया था। मुख्यमंत्री ने इसे मध्यप्रदेश के ऊर्जा क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण परियोजना बताया था। गाडरवाड़ा पहले से ही प्रदेश के प्रमुख ऊर्जा केंद्रों में शामिल है। अब इस विस्तार परियोजना के जरिए न सिर्फ बिजली उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। निर्माण कार्य और परियोजना संचालन से हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना जताई जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित दौरे को लेकर बीजेपी और प्रशासनिक अमले में भी उत्साह का माहौल है। सुरक्षा व्यवस्था से लेकर कार्यक्रम स्थल की तैयारियों तक सभी व्यवस्थाओं पर तेजी से काम किया जा रहा है। माना जा रहा है कि यदि प्रधानमंत्री का दौरा तय होता है तो यह प्रदेश की ऊर्जा और औद्योगिक विकास योजनाओं के लिए बड़ा संदेश माना जाएगा।

हेमंत खंडेलवाल की नितिन नबीन से मुलाकात ने बदले राज्यसभा के समीकरण !

मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दलों में दावेदारों की लंबी सूची सामने आ रही है। सत्ता पक्ष भाजपा जहां अपने संगठन और सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटी है, वहीं कांग्रेस अपनी एकमात्र संभावित सीट बचाने की रणनीति बना रही है। इस बार का चुनाव केवल संख्या बल का नहीं, बल्कि राजनीतिक मैनेजमेंट, क्रॉस वोटिंग और अंदरूनी गुटबाजी की परीक्षा भी माना जा रहा है। मध्य प्रदेश से इस बार राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव होना है। इनमें वर्तमान सांसद दिग्विजय सिंह,, जार्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। मौजूदा विधानसभा गणित के हिसाब से भाजपा दो सीटों पर मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है, जबकि कांग्रेस एक सीट के लिए संघर्ष कर रही है। भाजपा की बात करें तो पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती दावेदारों के बीच संतुलन बनाने की है। भाजपा संगठन इस बार सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को प्राथमिकता दे रहा है पार्टी चाहती है कि राज्यसभा के जरिए ओबीसी, आदिवासी और महिला प्रतिनिधित्व का संदेश दिया जाए। इसी कारण कई नाम चर्चा में हैं। सबसे पहले वर्तमान सांसद जार्ज कुरियन का नाम सामने आता है। हालांकि वे राष्ट्रीय राजनीति में पहले से सक्रिय हैं और भाजपा नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं, इसलिए उनकी पुनः राज्यसभा वापसी लगभग तय मानी जा रही है। कुरियन भाजपा के क्रिश्चियन फेस और केरल की उम्मीद माने जाते है,,लेकिन पूरे कार्यकाल में उनकी मध्य प्रदेश से दूरी सवाल खड़े करती है दूसरा बड़ा नाम डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी का है। आदिवासी वर्ग से आने वाले सोलंकी को भाजपा फिर मौका दे सकती है। पार्टी आदिवासी वोट बैंक को लेकर काफी सतर्क है क्योंकि आगामी चुनावों में यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभा सकता है।हालांकि वो अपना इम्पैक्ट नहीं छोड़ पाय है और वर्तमान में।प्रदेश संगठन में महामंत्री भी बनाये गए हैं पूर्व गृहमंत्री और संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले नरोत्तम मिश्रा को लेकर भी अटकलें हैं। भाजपा उन्हें दिल्ली की राजनीति में बड़ी भूमिका दे सकती है। लेकिन दतिया में उपचुनाव की संभावना के चलते कुछ तय होना मुश्किल लग रहा है संगठन और राष्ट्रीय राजनीति में अनुभव होने के कारण कैलाश विजयवर्गीय का नाम भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा में बना हुआ है।लेकिन उनके विवादित बयानों से दिल्ली नाराज बताई जा रही है भाजपा के अंदर कुछ नए नाम भी तेजी से चर्चा में हैं। संगठन से जुड़े नेताओं का मानना है कि पार्टी इस बार किसी बड़े संगठनात्मक चेहरे को भी राज्यसभा भेज सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले नामों की चर्चा हो रही है। हालांकि भाजपा की रणनीति हमेशा अंतिम समय तक गोपनीय रखने की रही है। अब बात कांग्रेस की करें तो पार्टी की स्थिति भाजपा की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है। विधानसभा में संख्या कम होने के कारण कांग्रेस को अपनी एकमात्र सीट बचाने के लिए पूरी ताकत लगानी होगी। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कांग्रेस के पास दावेदार ज्यादा हैं और सीट केवल एक। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। लेकिन उन्होंने संकेत दिए हैं कि वे दोबारा राज्यसभा जाने के इच्छुक नहीं हैं। इससे कांग्रेस में नए दावेदारों के लिए रास्ता खुल गया है। कांग्रेस की ओर से सबसे चर्चित नाम जीतू पटवारी का माना जा रहा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष होनेके साथ उनका दिल्ली में प्रभाव भी काफी माना जाता है। हालांकि दिग्गज उन्हें चुनौती दे रहे है,लेकिन कांग्रेस के अंदर उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा कमलनाथ और उनके समर्थक खेमे के कुछ नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं। कमलनाथ गुट चाहता है कि राज्यसभा में ऐसा चेहरा जाए जो संगठन और संसदीय राजनीति दोनों में मजबूत हो। आर्थिक समीकरणों के लिहाज से नाथ परिवार के किसी सदस्य को मौका मिल सकता है,, लेकिन राहुल गांधी से कमलनाथ की दुरिया इसमें आड़े आ सकती हैं कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस किसी युवा या ओबीसी चेहरे पर भी दांव खेल सकती है, इनमें पहला नाम कमलेश्वर पटेल का है,, जो राहुल गांधी के करीबी तो है ही ,,उनकी विंध्य के मजबूत राजनैतिक पारिवारिक विरासत भी है ओबीसी चेहरों के फेहरिस्त में अरुण यादव का भी नाम है ,, लेकिन उन्हें फ़िलहाल किसी भी बड़े नेता का समर्थन नजर नहीं आता ,, साथ में लगातार चुनाव हारने का रिकॉर्ड उनके खिलाफ जाता दिखता है.. महिला चेहरों में।मीनाक्षी नटराजन के नाम की भी जमकर चर्चा है लेकिन दिग्विजय सिंह उनके विरोध में खुलकर मोर्चा खोले हुए है कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता क्रॉस वोटिंग की आशंका है। पार्टी नेतृत्व को डर है कि यदि कुछ विधायक टूटते हैं या मतदान के दौरान गड़बड़ी होती है, तो भाजपा तीसरी सीट पर भी दावा ठोक सकती है। यही वजह है कि कांग्रेस लगातार विधायकों की बैठकों और एकजुटता पर जोर दे रही है। भाजपा की रणनीति भी काफी आक्रामक दिखाई दे रही है। पार्टी नेताओं के बयान साफ संकेत दे रहे हैं कि भाजपा कांग्रेस की सीट पर भी नजर बनाए हुए है। भाजपा मानती है कि कांग्रेस के अंदर असंतोष है और यदि राजनीतिक परिस्थितियां बनीं तो तीसरी सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार राज्यसभा चुनाव केवल सांसद चुनने तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव 2028 के विधानसभा चुनावों की दिशा भी तय कर सकता है। भाजपा राज्यसभा के जरिए संगठन और सामाजिक संतुलन मजबूत करना चाहती है, जबकि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखकर यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी अभी भी मुकाबले में है। वैसे तो महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राज्यसभा चुनावों के जरिए दिल्ली की राजनीति में भी संदेश जाता है। भाजपा यदि अपने मजबूत और भरोसेमंद चेहरों को राज्यसभा भेजती है तो केंद्र में मध्य प्रदेश की भूमिका और मजबूत होगी। वहीं कांग्रेस यदि अपनी सीट बचाने में सफल रहती है तो यह उसके लिए मनोबल बढ़ाने वाला परिणाम होगा।कुल मिलाकर मध्य प्रदेश का राज्यसभा चुनाव इस बार बेहद रोचक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। भाजपा संख्या बल के आधार पर मजबूत दिख रही है, लेकिन कांग्रेस भी अपनी एक सीट बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। आने वाले दिनों में दावेदारों के नामों को लेकर दिल्ली से लेकर भोपाल तक बैठकों का दौर तेज होगा और अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान ही करेगा। फिलहाल इतना तय है कि राज्यसभा चुनाव के बहाने मध्य प्रदेश की राजनीति में गर्मी बढ़ चुकी है।

Wednesday, May 27, 2026

सिंधिया समर्थकों की इस्तीफे की तैयारी


भोपाल। मध्य प्रदेश बीजेपी में निगम-मंडलों और प्राधिकरणों की नियुक्तियों के बाद अब अंदरूनी नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। सबसे ज्यादा चर्चा सिंधिया खेमे को लेकर हो रही है। पार्टी और सरकार में अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिलने से ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों में बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि कुछ नेता संगठन और पदों से इस्तीफे जैसी रणनीति पर भी विचार कर रहे हैं। दरअसल, मोहन यादव सरकार द्वारा लगातार राजनीतिक नियुक्तियां की जा रही हैं, लेकिन सिंधिया समर्थकों को अब तक सीमित जगह ही मिल पाई है। जबकि 2020 में सत्ता परिवर्तन के दौरान सिंधिया के साथ खड़े रहने वाले कई नेताओं को उम्मीद थी कि उन्हें सरकार और संगठन में अहम जिम्मेदारियां मिलेंगी।

2020 में सत्ता परिवर्तन के हीरो, अब इंतजार में समर्थक

ज्योतिरादित्य सिंधिया जब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए थे, तब उनके साथ कई विधायकों और नेताओं ने भी पार्टी बदली थी। उसी राजनीतिक घटनाक्रम ने कमलनाथ सरकार गिराई और बीजेपी को दोबारा सत्ता में पहुंचाया। उस दौर में सिंधिया समर्थकों का प्रभाव सरकार और संगठन दोनों में साफ दिखाई देता था। शिवराज सरकार में सिंधिया खेमे के नेताओं को मंत्री पद और संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिली थीं। लेकिन अब हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं। निगम-मंडलों की सूची में सिंधिया समर्थकों को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में असंतोष बढ़ रहा है।

कई बड़े चेहरे अब भी इंतजार में

सिंधिया खेमे के जिन नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद थी, वे अब भी इंतजार कर रहे हैं। इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसौदिया, गिर्राज दंडोतिया, रघुराज कंसाना, मुन्नालाल गोयल और रक्षा संतराम सरोनिया जैसे कई नेताओं को अब तक कोई अहम पद नहीं मिला है। अब तक हुई नियुक्तियों में सिंधिया समर्थकों में सिर्फ दो नाम—सुधीर गुप्ता और अशोक शर्मा—को ही जगह मिल पाई है। यही वजह है कि समर्थकों के बीच यह संदेश जा रहा है कि पार्टी में सिंधिया खेमे का प्रभाव पहले जैसा मजबूत नहीं रहा।

इस्तीफे की अटकलों ने बढ़ाई हलचल

बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो कुछ सिंधिया समर्थक नेता लगातार खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि यदि आने वाले समय में राजनीतिक संतुलन नहीं साधा गया तो कुछ नेता संगठनात्मक पदों या जिम्मेदारियों से इस्तीफा देकर दबाव की राजनीति अपना सकते हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर किसी नेता ने इस्तीफे की बात नहीं कही है, लेकिन अंदरखाने बढ़ती नाराजगी को बीजेपी नेतृत्व गंभीरता से देख रहा है।

विरोधियों को मिली जगह, बढ़ी नाराजगी

सिंधिया समर्थकों की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में सिंधिया के विरोधी माने जाने वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिली हैं। केपी यादव और रामनिवास रावत जैसे नेताओं को अहम पद मिलने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि पार्टी अब नए शक्ति संतुलन पर काम कर रही है।

बीजेपी का फोकस अब संगठन आधारित राजनीति पर?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब प्रदेश में किसी एक नेता या गुट पर निर्भर रहने के बजाय संगठन आधारित राजनीति को मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश संगठन अपनी अलग कार्यशैली के साथ राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। फिलहाल, निगम-मंडलों की नियुक्तियों ने बीजेपी के भीतर सिंधिया खेमे की स्थिति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है। अब सभी की नजर आने वाले दिनों में होने वाली अगली राजनीतिक नियुक्तियों और संगठनात्मक फैसलों पर टिकी है, क्योंकि वही तय करेंगे कि बीजेपी में सिंधिया समर्थकों की नाराजगी शांत होती है या सियासी संकट और गहराता है।


योगमय हुआ खजुराहो, शुरू हुआ काउंटडाउन

खजुराहो। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के 25 दिवसीय काउंटडाउन के अवसर पर विश्व धरोहर नगरी खजुराहो में “योग महोत्सव 2026” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वर्चुअली संबोधित करते हुए योग और भारतीय संस्कृति के महत्व पर जोर दिया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि योग और खजुराहो, दोनों ही भारतीय संस्कृति के अभिन्न स्तंभ हैं। योग भारत की प्राचीन परंपरा और जीवन पद्धति का प्रतीक है, जबकि खजुराहो भारतीय कला, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत की पहचान है। उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संतुलन का माध्यम भी है। सीएम डॉ. यादव ने कहा कि राज्य सरकार योग को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़कर स्वस्थ, जागरूक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध समाज के निर्माण की दिशा में लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने लोगों से नियमित योग अपनाने और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने की अपील भी की। कार्यक्रम में योग साधकों, विद्यार्थियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। विश्व प्रसिद्ध खजुराहो की ऐतिहासिक धरोहरों के बीच आयोजित योग महोत्सव ने भारतीय संस्कृति और योग परंपरा की विशेष छाप छोड़ी। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 को लेकर प्रदेशभर में विभिन्न कार्यक्रमों और जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। खजुराहो में आयोजित यह योग महोत्सव उसी श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।