Wednesday, April 22, 2026

बयानों से बवाल,, नेताओं पर सवाल



भोपाल। मध्यप्रदेश की सियासत इन दिनों मुद्दों से ज्यादा जुबानों की फिसलन पर अटकी हुई नजर आ रही है। हर कुछ दिनों में कोई न कोई वीडियो सामने आता है, बयान सुर्खियों में छा जाता है, और फिर शुरू हो जाता है वही पुराना सिलसिला- सफाई, सियासत और सन्नाटा। सवाल ये है कि क्या अब यह सब नई सामान्य राजनीति बनती जा रही है?

ताजा मामला करैरा विधायक प्रीतम सिंह लोधी का है। एक सड़क हादसे से शुरू हुआ विवाद उस वक्त सियासी तूफान बन गया, जब उनका एक वीडियो सामने आया- जिसमें वे पुलिस अधिकारी के खिलाफ कथित तौर पर अभद्र और धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल करते नजर आए। मामला इतना बढ़ा कि आम तौर पर संयम बरतने वाला पुलिस महकमा भी खुलकर नाराज दिखा।

लेकिन कहानी यहीं से शुरू नहीं होती… यह तो बस ताजा एपिसोड है। इससे पहले मंत्री कुंवर विजय शाह का मामला सामने आया था, जहां एक महिला सैन्य अधिकारी पर की गई टिप्पणी ने ऐसा बवाल मचाया कि बात अदालतों तक जा पहुंची और आखिरकार माफी ही एकमात्र रास्ता बचा।

वहीं बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्भीगीय इस सूची में मजबूती से अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं। हाल ही में इंदौर में दूषित पानी के मुद्दे पर जब पत्रकारों ने सवाल उठाए, तो जवाब देने के बजाय उनका तेवर ही खबर बन गया। कैमरे में कैद हुई तीखी नोकझोंक ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या अब सत्ता के सामने सवाल पूछना भी “जोखिम भरा काम” बनता जा रहा है। यानी मुद्दा था जनता के पानी का, लेकिन बहस पहुंच गई सवाल पूछने की हिम्मत तक। इससे पहले भी विजयवर्गीय महिलाओं को लेकर अपनी टिप्पणी के कारण विवादों में रह चुके हैं। उनके बयान ने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता तक बहस छेड़ दी थी—लेकिन कुछ दिन शोर-शराबे के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

इसी कड़ी में नरेंद्र कुशवाहा का नाम भी जुड़ता है, जिनका एक वीडियो सामने आया था। उसमें एक महिला अधिकारी से उनका तीखा लहजा चर्चा का विषय बना—और सवाल फिर वही, क्या यह सिर्फ “गुस्सा” था या “गैर-जिम्मेदारी”?

यानी तस्वीर कुछ यूं बनती है- कि सत्ताधारी पक्ष के नेताओं का बयान आता है,, बवाल होता है,, सफाई दी जाती है,, और फिर मामला समय की धूल में दब जाता है। दिलचस्प या कहें अर्थपूर्ण बात यह है कि प्रतीम सिंह लोधी पहले भी विवादों के केंद्र में रह चुके हैं। ब्राह्मण समाज को लेकर टिप्पणी के बाद उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था, लेकिन समय बीतते ही वापसी भी हो गई। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या सियासत में स्थायी नाराजगी नाम की कोई चीज बची भी है, या सब कुछ परिस्थितियों के हिसाब से रीसेट हो जाता है?

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