Sunday, February 15, 2026

कौन हैं हिमांगी सखी? देश की पहली किन्नर शंकराचार्य


भोपाल। भोपाल में हाल ही में आयोजित किन्नर धर्म सम्मेलन ने इतिहास रच दिया। इस मौके पर हिमांगी सखी को देश की पहली किन्नर शंकराचार्य के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। यह पल न सिर्फ किन्नर समाज के लिए बल्कि पूरे देश में धर्म और सामाजिक दृष्टिकोण के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। हिमांगी सखी का जीवन संघर्ष, समर्पण और आध्यात्मिक नेतृत्व का प्रतीक है। आइए जानते हैं कि कौन हैं हिमांगी सखी और कैसे बनीं पहली किन्नर शंकराचार्य।

आध्यात्मिक नेतृत्व और धार्मिक योगदान

हिमांगी सखी किन्नर समुदाय की एक प्रमुख धार्मिक नेता हैं। वे पहली किन्नर भागवत कथा वाचक हैं और अपने प्रवचनों के जरिए किन्नरों को धर्म और आध्यात्म से जोड़ती हैं। उन्होंने कई धार्मिक आयोजनों और महाकुम्भ जैसे बड़े मेलों में भागवत कथा सुनाकर अपने समुदाय के भीतर आध्यात्मिक चेतना बढ़ाई है। उनकी खासियत यह है कि वे पांच भाषाओं में धार्मिक कथाएँ सुनाती हैं और उन्हें सुनने वाले समुदाय में गहरी छाप छोड़ती हैं। सनातन और वैष्णव परंपराओं को किन्नरों तक पहुँचाना और धार्मिक गतिविधियों में उनका सक्रिय योगदान सुनिश्चित करना उनके मिशन का हिस्सा रहा है।

अखाड़ा और नेतृत्व का विस्तार

पिछले वर्षों में हिमांगी सखी ने किन्नर अखाड़ों को संगठित किया और अपने नेतृत्व से समुदाय में धार्मिक गतिविधियों को मजबूती दी। उन्होंने न केवल धार्मिक शिक्षा का प्रचार किया बल्कि किन्नरों को आध्यात्मिक रूप से सक्रिय और संगठित करने का काम भी किया। महाकुम्भ 2025 जैसे आयोजनों में उन्होंने वैष्णव किन्नर अखाड़ा स्थापित करने की योजना बनाई, ताकि किन्नर धर्मशास्त्र और पूजा-पद्धति के ज्ञान से जुड़ सकें और समाज में समान धार्मिक अवसर पा सकें।

पहली किन्नर शंकराचार्य का पट्टाभिषेक और पुष्कर पीठ

महाशिवरात्रि 2026 के मौके पर हिमांगी सखी का भव्य पट्टाभिषेक हुआ और उन्हें देश की पहली किन्नर शंकराचार्य के रूप में सम्मानित किया गया। यह पद किन्नर समाज के सबसे ऊँचे धार्मिक नेतृत्व का प्रतीक है। सम्मेलन में उनके साथ जगद्गुरु और महामंडलेश्वर जैसे पदों की घोषणा भी की गई। हिमांगी सखी को पुष्कर पीठ का नेतृत्व सौंपा गया, जहाँ से वे अब धार्मिक गतिविधियों और समुदाय की आध्यात्मिक दिशा निर्धारित करेंगी।

सामाजिक और आध्यात्मिक प्रभाव

हिमांगी सखी की कहानी सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं है। उन्होंने किन्नर समुदाय की आवाज़ को सशक्त किया और उन्हें सामाजिक मान्यता दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उनके संघर्ष और नेतृत्व ने यह साबित कर दिया है कि दृढ़ संकल्प, समर्पण और पहचान से कोई भी व्यक्ति या समुदाय अपनी कहानी खुद लिख सकता है।

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