उज्जैन से एक ऐसा वीडियो सामने आया है, जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया। जहां शिक्षा और संस्कारों की उम्मीद की जाती है, वहीं एक गुरुकुल में छात्र के साथ बेरहमी की सारी हदें पार कर दी गईं। महर्षि सांदीपनी राष्ट्रीय वेदविद्या संस्थान में एक वार्डन ने एक मासूम छात्र को डंडे से इस कदर पीटा कि उसकी दर्द भरी चीखें पूरे परिसर में गूंजती रहीं। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि छात्र दर्द से कराह रहा है, लेकिन वार्डन का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा। बताया जा रहा है कि छात्र की “गलती” सिर्फ इतनी थी कि वह दूसरे छात्र के बिस्तर पर सो गया था। इस छोटी सी बात पर इतनी क्रूर सजा—यह सवाल अब हर किसी के मन में उठ रहा है। यह घटना सिर्फ एक छात्र की पिटाई नहीं, बल्कि उस भरोसे पर भी चोट है जो माता-पिता अपने बच्चों को गुरुकुल भेजते समय करते हैं। जहां उन्हें संस्कार, अनुशासन और शिक्षा मिलने की उम्मीद होती है, वहीं इस तरह की बर्बरता ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो सामने आने के बाद लोगों में गुस्सा है और जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई की मांग तेज हो गई है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या उस मासूम को न्याय मिल पाएगा।
Sunday, March 22, 2026
Saturday, March 21, 2026
बीजेपी महिला मोर्चा और पिछड़ा वर्ग की प्रदेश कार्यकारिणी घोषित
कार्यकारिणी घोषित
कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ चुकीं मोना सुस्तानी महामंत्री बनीं
उपाध्यक्ष
नीलिमा शिंदे (ग्वालियर)
आशा गुप्ता (पन्ना)
माया पटेल (देवास)
शालिनी सरावगी (शहडोल)
एड़. अंजना पटेल (बड़वानी)
विभा श्रीवास्तव (अशोकनगर)
डॉ याकृति जाड़िया (सागर)
प्रदेश मंत्री
शशि पटेल (मंडला)
खुशबू गुप्ता (ग्वालियर)
रीना दंडोतिया (मुरैना)
ममता मालवीय (बैतूल)
डॉ. अंजली रायजादा (ग्वालियर)
चारुलता यादव (खंडवा)
सीमा जायसवाल (सिंगरौली)
प्रमिला यादव (उज्जैन)
कोषाध्यक्ष एवं कार्यालय प्रभार
कोषाध्यक्ष: CA निधि बंग (इंदौर)
सह कोषाध्यक्ष: अर्चना अग्रवाल (जबलपुर) , पूर्णिमा तिवारी (रीवा)
कार्यालय मंत्री: भावना सिंह (भोपाल)
सह कार्यालय मंत्री: विमला तिवारी (भोपाल) , ललिता पुर्तिया (नर्मदापुरम)
भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा की प्रदेश कार्यकारिणी भी घोषित
की गई है इसमें सुरजीत सिंह चौहान को उपाध्यक्ष और अतीत पवार को मंत्री बनाया गया है ...
भोपाल में ईद बनी ग़म का दिन, जानें काली पट्टी बांधकर किस चीज का जताया विरोध
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में ईद के मौके पर इस बार एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। जहां आमतौर पर ईद खुशियों और जश्न का त्योहार होता है, वहीं शहर के शिया समुदाय ने इसे शोक और विरोध के रूप में मनाया। ईद की नमाज के बाद कई इलाकों में “अमेरिका-इजराइल मुर्दाबाद” के नारे लगाए गए। यह विरोध मौजूदा अंतरराष्ट्रीय तनाव और मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है, खासतौर पर ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव के संदर्भ में।
काली पट्टी और सादगी में अदा की नमाज
शिया समुदाय के लोग ईद की नमाज के लिए काली पट्टी बांधकर पहुंचे। कई लोगों ने नए कपड़े पहनने के बजाय पुराने कपड़ों में ही नमाज अदा की। समुदाय के लोगों का कहना था कि यह समय जश्न का नहीं बल्कि ग़म का है।नमाज के दौरान अयातुल्ला अली खामेनेई की तस्वीरें भी देखी गईं। कुछ लोगों ने दावा किया कि हालिया हमलों में उनकी “शहादत” हुई है, जिसके चलते वे शोक मना रहे हैं।
ईरान के समर्थन में दुआएं
नमाज के दौरान ईरान की जीत के लिए विशेष दुआएं की गईं। समुदाय के लोगों ने कहा कि वैश्विक स्तर पर हो रहे संघर्ष में वे ईरान के साथ खड़े हैं।
त्योहार पर नहीं बना कोई पकवान
शिया समुदाय के कई परिवारों ने इस बार ईद पर कोई विशेष पकवान नहीं बनाया। न तो सेवइयां बनाई गईं और न ही मिठाइयां बांटी गईं। लोगों का कहना था कि ग़म के माहौल में जश्न मनाना उचित नहीं है।
युद्ध के माहौल का स्थानीय असर
मध्य पूर्व में चल रहे तनाव और संभावित युद्ध जैसी स्थिति का असर अब भारत के शहरों तक भी दिखाई देने लगा है। भोपाल में हुआ यह विरोध इसी बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाएं स्थानीय समाज को भी प्रभावित कर रही हैं। प्रशासन की ओर से स्थिति पर नजर रखी जा रही है, हालांकि फिलहाल माहौल शांतिपूर्ण बताया जा रहा है।
राज्यसभा के लिए दिग्विजय और अरुण यादव की दावेदारी हुई मजबूत !
मध्य प्रदेश में राज्यसभा के लिए सबसे ज्यादा मजबूत दावेदारी कांग्रेस में दिग्विजय सिंह और अरुण यादव की नजर आ रही है इसका सबसे बड़ा कारण कांग्रेस को क्रॉस वोटिंग का डर है असल में मध्य प्रदेश में कांग्रेस को दिग्विजय सिंह की खाली होने वाली सीट पर फिलहाल तो जीत नजर आ रही है,, लेकिन कांग्रेस के पास जरूरी 58 वोटो से सिर्फ पांच ज्यादा है,, ऐसे में कांग्रेस ऐसी उम्मीदवार की तलाश में है जिससे कांग्रेस को अन्य राज्यों की तरह नुकसान ना उठाना पड़े,, पिछले दिनों हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अपनों से ही धोखा खा चुकी है,, ऐसे में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की तैयारी है कि उसे मजबूत चेहरे को मैदान में लाया जाए जो क्रॉस वोटिंग को रोक सके,, मध्य प्रदेश में वर्तमान के कांग्रेस विधायकों में सबसे ज्यादा समर्थक दिग्विजय सिंह और उसके बाद अरुण यादव के हैं,, यही कारण है कि अब दिग्विजय सिंह और अरुण यादव की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है हालांकि अरुण यादव के साथ अगर उमंग सिंघार खड़े होते हैं तो यादव और आगे निकल सकते हैं, क्योंकि वह पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व भी करते हैं पिछड़ा वर्ग से ही कमलेश्वर पटेल भी अपनी उम्मीदवारी जाता रहे हैं, इनके साथ-साथ कमलनाथ के नाम की भी अटकलें लगातार लगाई जा रही हैं,दिल्ली में जोर आजमाइश करने वालों में सज्जन सिंह वर्मा और मुकेश नायक जैसे नाम भी शामिल है...
Friday, March 20, 2026
मेहनत पर मौसम की मार, खेतों में बिखरे सपने
देशभर में मौसम की मार से जूझ रहे किसानों को लेकर केंद्र सरकार अलर्ट मोड में आ गई है। बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने कई राज्यों में खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है—वो फसलें, जिनके सहारे किसान पूरे साल की उम्मीदें जोड़कर बैठे थे।
इसी स्थिति को देखते हुए नरेंद्र मोदी ने देश के कृषि परिदृश्य की विस्तृत समीक्षा की। उन्होंने खास तौर पर उन इलाकों पर ध्यान देने के निर्देश दिए, जहां असमय बारिश और ओलावृष्टि से फसलें बर्बाद हुई हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि जिन क्षेत्रों में फसलें पककर तैयार थीं, वहां अचानक बारिश और ओलों ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। कई जगह फसलें जमीन पर गिर गई हैं, जिससे नुकसान और बढ़ गया है।
सरकार ने राज्यों के साथ तुरंत समन्वय बनाने के निर्देश दिए हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहां-कहां कितना नुकसान हुआ है। साथ ही, फसल बीमा योजना से जुड़े अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे तेजी से क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट कराएं और वैज्ञानिक तरीके से नुकसान का सही आकलन करें।
सरकार का फोकस इस बात पर है कि जिन किसानों की फसलें खराब हुई हैं, उन्हें बीमा का पैसा समय पर और सही तरीके से मिल सके, ताकि उनकी आर्थिक परेशानी कुछ कम हो सके।
इस बीच मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में दो और पश्चिमी विक्षोभ की संभावना जताई है, जिससे हालात और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में किसानों को सतर्क रहने और जरूरी सलाह देने पर भी जोर दिया गया है।
कुल मिलाकर, यह वक्त किसानों के लिए बेहद कठिन है—एक तरफ मौसम की मार, तो दूसरी तरफ फसल की चिंता। अब नजर इस बात पर है कि राहत और मुआवजा कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी तरीके से किसानों तक पहुंच पाता है।
अपने मकसद से भटकी लाड़ली लक्ष्मी योजना? आंकड़ों ने खोली जमीनी सच्चाई
बेटियों के उज्ज्वल भविष्य का दावा… हजारों करोड़ का खर्च… और लाखों पंजीयन—लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखा रही है। लाड़ली लक्ष्मी योजना को लेकर सामने आए ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि जो योजना कभी सशक्तिकरण की मिसाल मानी जाती थी, वही अब अपनी प्रभावशीलता पर गंभीर सवालों में घिरी हुई है।
पिछले 19 साल में प्रदेश में 52 लाख से ज्यादा बेटियों का पंजीयन हुआ, लेकिन इनमें से सिर्फ करीब 20 प्रतिशत ही बारहवीं तक पहुंच पा रही हैं। यानी बड़ी संख्या में बेटियां बीच रास्ते में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं। साल 2010-11 में पहली कक्षा में दाखिला लेने वाली 11.07 लाख बच्चियों में से केवल 3.44 लाख ही 12वीं तक पहुंच सकीं, और हाल के वर्षों में यह प्रतिशत और गिरकर करीब 20 प्रतिशत के आसपास रह गया है। छठी कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते संख्या आधी रह जाती है और नौवीं तक आते-आते यह और कम हो जाती है। ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि शिक्षा तक निरंतर पहुंच बनाए रखना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
योजना पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं और मौजूदा बजट में भी करीब 1800 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर हालात उम्मीद के मुताबिक नहीं बदल पाए हैं। स्कूलों की गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी और सामाजिक परिस्थितियों जैसे बुनियादी मुद्दे अब भी सामने खड़े हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सिर्फ आर्थिक सहायता देकर बेटियों की शिक्षा सुनिश्चित की जा सकती है, या फिर योजना अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक चुकी है।
स्थिति यह संकेत देती है कि समस्या केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि क्रियान्वयन और प्राथमिकताओं में भी कहीं न कहीं कमी है। अगर योजना का लक्ष्य वास्तव में बेटियों को शिक्षित और सशक्त बनाना होता, तो इसके साथ शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता।
अब निगाहें डॉ. मोहन यादव सरकार पर हैं कि वह इन खामियों को कैसे दूर करती है। क्योंकि यह मामला केवल एक योजना का नहीं, बल्कि लाखों बेटियों के भविष्य का है। अगर हालात नहीं बदले, तो “लाड़ली” सिर्फ नाम तक सीमित रह जाएगी, हकीकत में नहीं।
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