भोपाल। मध्य प्रदेश बीजेपी में निगम-मंडलों और प्राधिकरणों की नियुक्तियों के बाद अब अंदरूनी नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। सबसे ज्यादा चर्चा सिंधिया खेमे को लेकर हो रही है। पार्टी और सरकार में अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिलने से ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों में बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि कुछ नेता संगठन और पदों से इस्तीफे जैसी रणनीति पर भी विचार कर रहे हैं। दरअसल, मोहन यादव सरकार द्वारा लगातार राजनीतिक नियुक्तियां की जा रही हैं, लेकिन सिंधिया समर्थकों को अब तक सीमित जगह ही मिल पाई है। जबकि 2020 में सत्ता परिवर्तन के दौरान सिंधिया के साथ खड़े रहने वाले कई नेताओं को उम्मीद थी कि उन्हें सरकार और संगठन में अहम जिम्मेदारियां मिलेंगी।
2020 में सत्ता परिवर्तन के हीरो, अब इंतजार में समर्थक
ज्योतिरादित्य सिंधिया जब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए थे, तब उनके साथ कई विधायकों और नेताओं ने भी पार्टी बदली थी। उसी राजनीतिक घटनाक्रम ने कमलनाथ सरकार गिराई और बीजेपी को दोबारा सत्ता में पहुंचाया। उस दौर में सिंधिया समर्थकों का प्रभाव सरकार और संगठन दोनों में साफ दिखाई देता था। शिवराज सरकार में सिंधिया खेमे के नेताओं को मंत्री पद और संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिली थीं। लेकिन अब हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं। निगम-मंडलों की सूची में सिंधिया समर्थकों को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में असंतोष बढ़ रहा है।
कई बड़े चेहरे अब भी इंतजार में
सिंधिया खेमे के जिन नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद थी, वे अब भी इंतजार कर रहे हैं। इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसौदिया, गिर्राज दंडोतिया, रघुराज कंसाना, मुन्नालाल गोयल और रक्षा संतराम सरोनिया जैसे कई नेताओं को अब तक कोई अहम पद नहीं मिला है। अब तक हुई नियुक्तियों में सिंधिया समर्थकों में सिर्फ दो नाम—सुधीर गुप्ता और अशोक शर्मा—को ही जगह मिल पाई है। यही वजह है कि समर्थकों के बीच यह संदेश जा रहा है कि पार्टी में सिंधिया खेमे का प्रभाव पहले जैसा मजबूत नहीं रहा।
इस्तीफे की अटकलों ने बढ़ाई हलचल
बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो कुछ सिंधिया समर्थक नेता लगातार खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि यदि आने वाले समय में राजनीतिक संतुलन नहीं साधा गया तो कुछ नेता संगठनात्मक पदों या जिम्मेदारियों से इस्तीफा देकर दबाव की राजनीति अपना सकते हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर किसी नेता ने इस्तीफे की बात नहीं कही है, लेकिन अंदरखाने बढ़ती नाराजगी को बीजेपी नेतृत्व गंभीरता से देख रहा है।
विरोधियों को मिली जगह, बढ़ी नाराजगी
सिंधिया समर्थकों की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में सिंधिया के विरोधी माने जाने वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिली हैं। केपी यादव और रामनिवास रावत जैसे नेताओं को अहम पद मिलने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि पार्टी अब नए शक्ति संतुलन पर काम कर रही है।
बीजेपी का फोकस अब संगठन आधारित राजनीति पर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब प्रदेश में किसी एक नेता या गुट पर निर्भर रहने के बजाय संगठन आधारित राजनीति को मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश संगठन अपनी अलग कार्यशैली के साथ राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। फिलहाल, निगम-मंडलों की नियुक्तियों ने बीजेपी के भीतर सिंधिया खेमे की स्थिति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है। अब सभी की नजर आने वाले दिनों में होने वाली अगली राजनीतिक नियुक्तियों और संगठनात्मक फैसलों पर टिकी है, क्योंकि वही तय करेंगे कि बीजेपी में सिंधिया समर्थकों की नाराजगी शांत होती है या सियासी संकट और गहराता है।

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