Thursday, May 28, 2026
हेमंत खंडेलवाल की नितिन नबीन से मुलाकात ने बदले राज्यसभा के समीकरण !
मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दलों में दावेदारों की लंबी सूची सामने आ रही है। सत्ता पक्ष भाजपा जहां अपने संगठन और सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटी है, वहीं कांग्रेस अपनी एकमात्र संभावित सीट बचाने की रणनीति बना रही है। इस बार का चुनाव केवल संख्या बल का नहीं, बल्कि राजनीतिक मैनेजमेंट, क्रॉस वोटिंग और अंदरूनी गुटबाजी की परीक्षा भी माना जा रहा है।
मध्य प्रदेश से इस बार राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव होना है। इनमें वर्तमान सांसद दिग्विजय सिंह,, जार्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। मौजूदा विधानसभा गणित के हिसाब से भाजपा दो सीटों पर मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है, जबकि कांग्रेस एक सीट के लिए संघर्ष कर रही है।
भाजपा की बात करें तो पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती दावेदारों के बीच संतुलन बनाने की है।
भाजपा संगठन इस बार सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को प्राथमिकता दे रहा है
पार्टी चाहती है कि राज्यसभा के जरिए ओबीसी, आदिवासी और महिला प्रतिनिधित्व का संदेश दिया जाए। इसी कारण कई नाम चर्चा में हैं।
सबसे पहले वर्तमान सांसद जार्ज कुरियन का नाम सामने आता है। हालांकि वे राष्ट्रीय राजनीति में पहले से सक्रिय हैं और भाजपा नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं, इसलिए उनकी पुनः राज्यसभा वापसी लगभग तय मानी जा रही है। कुरियन भाजपा के क्रिश्चियन फेस और केरल की उम्मीद माने जाते है,,लेकिन पूरे कार्यकाल में उनकी मध्य प्रदेश से दूरी सवाल खड़े करती है
दूसरा बड़ा नाम डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी का है। आदिवासी वर्ग से आने वाले सोलंकी को भाजपा फिर मौका दे सकती है। पार्टी आदिवासी वोट बैंक को लेकर काफी सतर्क है क्योंकि आगामी चुनावों में यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभा सकता है।हालांकि वो अपना इम्पैक्ट नहीं छोड़ पाय है और वर्तमान में।प्रदेश संगठन में महामंत्री भी बनाये गए हैं
पूर्व गृहमंत्री और संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले नरोत्तम मिश्रा को लेकर भी अटकलें हैं। भाजपा उन्हें दिल्ली की राजनीति में बड़ी भूमिका दे सकती है। लेकिन दतिया में उपचुनाव की संभावना के चलते कुछ तय होना मुश्किल लग रहा है
संगठन और राष्ट्रीय राजनीति में अनुभव होने के कारण कैलाश विजयवर्गीय का नाम भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा में बना हुआ है।लेकिन उनके विवादित बयानों से दिल्ली नाराज बताई जा रही है
भाजपा के अंदर कुछ नए नाम भी तेजी से चर्चा में हैं। संगठन से जुड़े नेताओं का मानना है कि पार्टी इस बार किसी बड़े संगठनात्मक चेहरे को भी राज्यसभा भेज सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले नामों की चर्चा हो रही है। हालांकि भाजपा की रणनीति हमेशा अंतिम समय तक गोपनीय रखने की रही है।
अब बात कांग्रेस की करें तो पार्टी की स्थिति भाजपा की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है। विधानसभा में संख्या कम होने के कारण कांग्रेस को अपनी एकमात्र सीट बचाने के लिए पूरी ताकत लगानी होगी। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कांग्रेस के पास दावेदार ज्यादा हैं और सीट केवल एक।
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। लेकिन उन्होंने संकेत दिए हैं कि वे दोबारा राज्यसभा जाने के इच्छुक नहीं हैं। इससे कांग्रेस में नए दावेदारों के लिए रास्ता खुल गया है।
कांग्रेस की ओर से सबसे चर्चित नाम जीतू पटवारी का माना जा रहा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष होनेके साथ उनका दिल्ली में प्रभाव भी काफी माना जाता है। हालांकि दिग्गज उन्हें चुनौती दे रहे है,लेकिन कांग्रेस के अंदर उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
इसके अलावा कमलनाथ और उनके समर्थक खेमे के कुछ नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं। कमलनाथ गुट चाहता है कि राज्यसभा में ऐसा चेहरा जाए जो संगठन और संसदीय राजनीति दोनों में मजबूत हो। आर्थिक समीकरणों के लिहाज से नाथ परिवार के किसी सदस्य को मौका मिल सकता है,, लेकिन राहुल गांधी से कमलनाथ की दुरिया इसमें आड़े आ सकती हैं
कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस किसी युवा या ओबीसी चेहरे पर भी दांव खेल सकती है, इनमें पहला नाम कमलेश्वर पटेल का है,, जो राहुल गांधी के करीबी तो है ही ,,उनकी विंध्य के मजबूत राजनैतिक पारिवारिक विरासत भी है
ओबीसी चेहरों के फेहरिस्त में अरुण यादव का भी नाम है ,, लेकिन उन्हें फ़िलहाल किसी भी बड़े नेता का समर्थन नजर नहीं आता ,, साथ में लगातार चुनाव हारने का रिकॉर्ड उनके खिलाफ जाता दिखता है..
महिला चेहरों में।मीनाक्षी नटराजन के नाम की भी जमकर चर्चा है लेकिन दिग्विजय सिंह उनके विरोध में खुलकर मोर्चा खोले हुए है
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता क्रॉस वोटिंग की आशंका है। पार्टी नेतृत्व को डर है कि यदि कुछ विधायक टूटते हैं या मतदान के दौरान गड़बड़ी होती है, तो भाजपा तीसरी सीट पर भी दावा ठोक सकती है। यही वजह है कि कांग्रेस लगातार विधायकों की बैठकों और एकजुटता पर जोर दे रही है।
भाजपा की रणनीति भी काफी आक्रामक दिखाई दे रही है। पार्टी नेताओं के बयान साफ संकेत दे रहे हैं कि भाजपा कांग्रेस की सीट पर भी नजर बनाए हुए है। भाजपा मानती है कि कांग्रेस के अंदर असंतोष है और यदि राजनीतिक परिस्थितियां बनीं तो तीसरी सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार राज्यसभा चुनाव केवल सांसद चुनने तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव 2028 के विधानसभा चुनावों की दिशा भी तय कर सकता है। भाजपा राज्यसभा के जरिए संगठन और सामाजिक संतुलन मजबूत करना चाहती है, जबकि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखकर यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी अभी भी मुकाबले में है।
वैसे तो महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राज्यसभा चुनावों के जरिए दिल्ली की राजनीति में भी संदेश जाता है। भाजपा यदि अपने मजबूत और भरोसेमंद चेहरों को राज्यसभा भेजती है तो केंद्र में मध्य प्रदेश की भूमिका और मजबूत होगी। वहीं कांग्रेस यदि अपनी सीट बचाने में सफल रहती है तो यह उसके लिए मनोबल बढ़ाने वाला परिणाम होगा।कुल मिलाकर मध्य प्रदेश का राज्यसभा चुनाव इस बार बेहद रोचक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। भाजपा संख्या बल के आधार पर मजबूत दिख रही है, लेकिन कांग्रेस भी अपनी एक सीट बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। आने वाले दिनों में दावेदारों के नामों को लेकर दिल्ली से लेकर भोपाल तक बैठकों का दौर तेज होगा और अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान ही करेगा। फिलहाल इतना तय है कि राज्यसभा चुनाव के बहाने मध्य प्रदेश की राजनीति में गर्मी बढ़ चुकी है।
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