Saturday, April 4, 2026

MP में सियासत का सीक्रेट मिशन: विधायक बने टारगेट


भोपाल। मध्यप्रदेश में सियासत इन दिनों खुले मंच से ज्यादा बंद कमरों में तय होती दिख रही है। जून में होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए कागजों पर भले ही गणित साफ नजर आता हो—दो सीटें बीजेपी और एक कांग्रेस के खाते में—लेकिन असल खेल अब इस तय समीकरण को पलटने का है। बीजेपी ने तीसरी सीट पर कब्जे के लिए अंदरखाने ‘ऑपरेशन पॉलिटिक्स’ शुरू कर दिया है। विधानसभा की मौजूदा स्थिति इस पूरी रणनीति की कुंजी है। एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 58 विधायकों की जरूरत होती है। बीजेपी के पास इस समय 164 विधायक हैं, यानी दो सीटें जीतने में उसे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन तीसरी सीट के लिए आंकड़ा करीब 174 तक पहुंचता है, जहां बीजेपी को 10 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ती है। यहीं से खेल दिलचस्प और पेचीदा बनता है। कांग्रेस की स्थिति पहले ही कमजोर होती नजर आ रही है। उसके पास 64 विधायक थे, लेकिन विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा पर कोर्ट द्वारा मतदान पर रोक लगने के बाद संख्या घटकर 63 रह गई है। वहीं बीना से विधायक निर्मला सप्रे का रुख पहले से ही बीजेपी की ओर झुका हुआ माना जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस का आंकड़ा कागजों पर जितना दिखता है, जमीन पर उतना मजबूत नहीं माना जा रहा। यही वजह है कि बीजेपी अब ‘क्रॉस वोटिंग’ और ‘मैनेजमेंट’ के जरिए तीसरी सीट का गणित साधने में जुटी है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि अगर 4 से 5 विधायकों को अपने पक्ष में किया जा सके या वोटिंग के दौरान क्रॉस वोटिंग हो जाए, तो तीसरी सीट भी हासिल की जा सकती है। इस पूरे खेल में किसी भी तरह की खुली बयानबाजी से बचते हुए रणनीति को पर्दे के पीछे ही रखा जा रहा है। दिलचस्प यह भी है कि हाल के घटनाक्रम—जैसे विजयपुर के बाद दतिया विधायक राजेंद्र भारती की विधायकी जाना—को भी इसी बड़े सियासी समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। भले ही कोई दल खुलकर इसे स्वीकार नहीं कर रहा, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे ‘समीकरण सेट करने’ की प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि बीजेपी की नजर खास तौर पर मध्यप्रदेश के मध्य क्षेत्र और ग्वालियर-चंबल बेल्ट के कुछ विधायकों पर है। इसके अलावा जिन विधायकों के कानूनी मामले लंबित हैं, उन्हें भी साधने की कोशिशें जारी हैं। यानी यह लड़ाई सिर्फ संख्या की नहीं, बल्कि प्रभाव, दबाव और मौके की भी है। उधर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखना है। पार्टी अंदरखाने सतर्क जरूर है, लेकिन फिलहाल डिफेंसिव मोड में नजर आ रही है। अगर कांग्रेस ने समय रहते मजबूत रणनीति और प्रभावशाली उम्मीदवार नहीं उतारा, तो यह खतरा भी बन सकता है कि उसके हिस्से की एकमात्र सीट भी खतरे में पड़ जाए। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश में सियासत अब सीधी रेखा में नहीं चल रही, बल्कि हर कदम पर मोड़ ले रही है। कागजों का गणित कुछ और कहता है, जबकि जमीन पर चल रहा ‘ऑपरेशन पॉलिटिक्स’ कुछ और कहानी लिखने की तैयारी में है। अब नजर इस बात पर है कि कौन अपने पाले को बचा पाता है और कौन दूसरे के मैदान में सेंध लगा देता है। 

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