भोपाल। भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर मध्यप्रदेश में सियासत लगातार गरमाती जा रही है। इस अंतरराष्ट्रीय समझौते को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच तीखी जुबानी जंग छिड़ गई है, जिसमें दोनों नेता किसानों के हितों को लेकर एक-दूसरे पर सवाल उठा रहे हैं। जहां कांग्रेस इस डील को किसान विरोधी बता रही है, वहीं बीजेपी इसे राष्ट्रहित और कृषि क्षेत्र के लिए फायदेमंद कदम बता रही है। इस मुद्दे पर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और बयानबाजी का दौर लगातार जारी है।
ये डील किसान विरोधी- पटवारी
जीतू पटवारी ने इस समझौते को किसान विरोधी बताते हुए कहा कि अमेरिका में किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है, जबकि भारतीय किसानों को कम सहायता मिलती है। ऐसे में यह डील भारतीय किसानों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। उन्होंने सरकार से टैरिफ सूची, नॉन-टैरिफ शर्तें और प्रभाव रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की। पटवारी ने आशंका जताई कि सोयाबीन तेल और पोल्ट्री फीड के जरिए आयात बढ़ने से मध्य प्रदेश के किसानों की आमदनी प्रभावित होगी। उन्होंने MSP की सुरक्षा की लिखित गारंटी भी मांगी और विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी।
कृषि मंत्री ने बताया राष्ट्रहित और संतुलित सौदा
वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह समझौता राष्ट्रहित में संतुलित तरीके से किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सोयाबीन, मक्का, गेहूं, चावल, डेयरी और दालों जैसे संवेदनशील उत्पादों को डील से बाहर रखा गया है। शिवराज ने कहा कि अमेरिका से अनाज और डेयरी उत्पाद भारत में नहीं आएंगे, जबकि भारतीय चाय, कॉफी, फल और मसालों को अमेरिकी बाजार में शून्य शुल्क पर निर्यात की सुविधा मिलेगी। उन्होंने बताया कि इस समझौते से MSME, टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी और ऑटो सेक्टर को नए अवसर मिलेंगे। कृषि मंत्री ने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की दूरदर्शी नीति से उनके आरोप टिक नहीं पाए।
सियासी बहस के बीच किसानों की चिंता
फिलहाल भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। एक तरफ सरकार इसे किसानों और देश के विकास के लिए जरूरी कदम बता रही है, तो वहीं विपक्ष इसे अन्नदाता के हितों के खिलाफ समझौता करार दे रहा है। दोनों पक्ष अपने-अपने दावे और तर्क रख रहे हैं, लेकिन अब तक सरकार की ओर से सभी सवालों के स्पष्ट जवाब सामने नहीं आए हैं। ऐसे में आने वाला वक्त ही तय करेगा कि यह डील वास्तव में किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें वैश्विक बाजार से जोड़ने में मददगार साबित होगी या फिर इसका बोझ देश के अन्नदाता को उठाना पड़ेगा। फिलहाल किसान, विशेषज्ञ और राजनीतिक दल सभी इस समझौते के असर पर नजर बनाए हुए हैं।


