भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में शनिवार (18 अप्रैल 26) को हजारों शिक्षकों ने TET (टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट) की अनिवार्यता के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन किया। ‘मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा’ के तहत प्रदेशभर से आए शिक्षक दशहरा मैदान में जुटे और सरकार के फैसले के खिलाफ जमकर विरोध जताया। प्रदर्शन अध्यापक-शिक्षक संयुक्त मोर्चा के बैनर तले किया गया, जिसमें भर्ती नियमों में बदलाव और TET की अनिवार्यता खत्म करने की मांग उठाई गई।
प्रदर्शन में शामिल शिक्षकों का कहना है कि TET को अनिवार्य करने का फैसला पहले से कार्यरत और लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के भविष्य पर असर डाल रहा है। उनका आरोप है कि नई शर्तों के कारण हजारों शिक्षकों की नौकरी पर खतरा मंडरा सकता है। इसी मुद्दे को लेकर पहले ब्लॉक और जिला स्तर पर भी विरोध प्रदर्शन किए जा चुके हैं, लेकिन मांगें पूरी नहीं होने पर अब राजधानी में बड़ा आंदोलन किया जा रहा है।
हाल ही में सरकार द्वारा इस मामले में रिव्यू पिटीशन दाखिल किए जाने के बाद विवाद और गहरा गया है। शिक्षकों का कहना है कि इससे उनकी आशंकाएं और बढ़ गई हैं और अब वे आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
दशहरा मैदान में चल रहे इस प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में शिक्षक मौजूद रहे और प्रशासन की ओर से सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए। पूरे घटनाक्रम के बाद सरकार पर दबाव बढ़ता नजर आ रहा है।
क्या है TET (Teacher Eligibility Test)?
TET यानी टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट एक पात्रता परीक्षा होती है, जिसे पास करने के बाद ही उम्मीदवार को शिक्षक बनने के लिए योग्य माना जाता है। यह परीक्षा केंद्र और राज्य स्तर पर आयोजित की जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की गुणवत्ता बेहतर हो और वे न्यूनतम शैक्षणिक मानकों को पूरा करें।
क्यों बढ़ रहा है विरोध?
पहले से कार्यरत शिक्षकों पर नई शर्त लागू होने का विरोध
नौकरी पर संकट और सेवा निरंतरता को लेकर चिंता
भर्ती नियमों में बार-बार बदलाव से नाराजगी
सरकार की रिव्यू पिटीशन के बाद अनिश्चितता बढ़ी
लंबे समय से मांगों पर निर्णय न होने से असंतोष
कुल मिलाकर, TET अनिवार्यता को लेकर शिक्षकों और सरकार के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। राजधानी में हुए इस बड़े प्रदर्शन के बाद अब नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी है कि वह शिक्षकों की मांगों पर क्या फैसला लेती है।

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