Thursday, May 28, 2026

हेमंत खंडेलवाल की नितिन नबीन से मुलाकात ने बदले राज्यसभा के समीकरण !

मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दलों में दावेदारों की लंबी सूची सामने आ रही है। सत्ता पक्ष भाजपा जहां अपने संगठन और सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटी है, वहीं कांग्रेस अपनी एकमात्र संभावित सीट बचाने की रणनीति बना रही है। इस बार का चुनाव केवल संख्या बल का नहीं, बल्कि राजनीतिक मैनेजमेंट, क्रॉस वोटिंग और अंदरूनी गुटबाजी की परीक्षा भी माना जा रहा है। मध्य प्रदेश से इस बार राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव होना है। इनमें वर्तमान सांसद दिग्विजय सिंह,, जार्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। मौजूदा विधानसभा गणित के हिसाब से भाजपा दो सीटों पर मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है, जबकि कांग्रेस एक सीट के लिए संघर्ष कर रही है। भाजपा की बात करें तो पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती दावेदारों के बीच संतुलन बनाने की है। भाजपा संगठन इस बार सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को प्राथमिकता दे रहा है पार्टी चाहती है कि राज्यसभा के जरिए ओबीसी, आदिवासी और महिला प्रतिनिधित्व का संदेश दिया जाए। इसी कारण कई नाम चर्चा में हैं। सबसे पहले वर्तमान सांसद जार्ज कुरियन का नाम सामने आता है। हालांकि वे राष्ट्रीय राजनीति में पहले से सक्रिय हैं और भाजपा नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं, इसलिए उनकी पुनः राज्यसभा वापसी लगभग तय मानी जा रही है। कुरियन भाजपा के क्रिश्चियन फेस और केरल की उम्मीद माने जाते है,,लेकिन पूरे कार्यकाल में उनकी मध्य प्रदेश से दूरी सवाल खड़े करती है दूसरा बड़ा नाम डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी का है। आदिवासी वर्ग से आने वाले सोलंकी को भाजपा फिर मौका दे सकती है। पार्टी आदिवासी वोट बैंक को लेकर काफी सतर्क है क्योंकि आगामी चुनावों में यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभा सकता है।हालांकि वो अपना इम्पैक्ट नहीं छोड़ पाय है और वर्तमान में।प्रदेश संगठन में महामंत्री भी बनाये गए हैं पूर्व गृहमंत्री और संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले नरोत्तम मिश्रा को लेकर भी अटकलें हैं। भाजपा उन्हें दिल्ली की राजनीति में बड़ी भूमिका दे सकती है। लेकिन दतिया में उपचुनाव की संभावना के चलते कुछ तय होना मुश्किल लग रहा है संगठन और राष्ट्रीय राजनीति में अनुभव होने के कारण कैलाश विजयवर्गीय का नाम भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा में बना हुआ है।लेकिन उनके विवादित बयानों से दिल्ली नाराज बताई जा रही है भाजपा के अंदर कुछ नए नाम भी तेजी से चर्चा में हैं। संगठन से जुड़े नेताओं का मानना है कि पार्टी इस बार किसी बड़े संगठनात्मक चेहरे को भी राज्यसभा भेज सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले नामों की चर्चा हो रही है। हालांकि भाजपा की रणनीति हमेशा अंतिम समय तक गोपनीय रखने की रही है। अब बात कांग्रेस की करें तो पार्टी की स्थिति भाजपा की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है। विधानसभा में संख्या कम होने के कारण कांग्रेस को अपनी एकमात्र सीट बचाने के लिए पूरी ताकत लगानी होगी। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कांग्रेस के पास दावेदार ज्यादा हैं और सीट केवल एक। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। लेकिन उन्होंने संकेत दिए हैं कि वे दोबारा राज्यसभा जाने के इच्छुक नहीं हैं। इससे कांग्रेस में नए दावेदारों के लिए रास्ता खुल गया है। कांग्रेस की ओर से सबसे चर्चित नाम जीतू पटवारी का माना जा रहा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष होनेके साथ उनका दिल्ली में प्रभाव भी काफी माना जाता है। हालांकि दिग्गज उन्हें चुनौती दे रहे है,लेकिन कांग्रेस के अंदर उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा कमलनाथ और उनके समर्थक खेमे के कुछ नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं। कमलनाथ गुट चाहता है कि राज्यसभा में ऐसा चेहरा जाए जो संगठन और संसदीय राजनीति दोनों में मजबूत हो। आर्थिक समीकरणों के लिहाज से नाथ परिवार के किसी सदस्य को मौका मिल सकता है,, लेकिन राहुल गांधी से कमलनाथ की दुरिया इसमें आड़े आ सकती हैं कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस किसी युवा या ओबीसी चेहरे पर भी दांव खेल सकती है, इनमें पहला नाम कमलेश्वर पटेल का है,, जो राहुल गांधी के करीबी तो है ही ,,उनकी विंध्य के मजबूत राजनैतिक पारिवारिक विरासत भी है ओबीसी चेहरों के फेहरिस्त में अरुण यादव का भी नाम है ,, लेकिन उन्हें फ़िलहाल किसी भी बड़े नेता का समर्थन नजर नहीं आता ,, साथ में लगातार चुनाव हारने का रिकॉर्ड उनके खिलाफ जाता दिखता है.. महिला चेहरों में।मीनाक्षी नटराजन के नाम की भी जमकर चर्चा है लेकिन दिग्विजय सिंह उनके विरोध में खुलकर मोर्चा खोले हुए है कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता क्रॉस वोटिंग की आशंका है। पार्टी नेतृत्व को डर है कि यदि कुछ विधायक टूटते हैं या मतदान के दौरान गड़बड़ी होती है, तो भाजपा तीसरी सीट पर भी दावा ठोक सकती है। यही वजह है कि कांग्रेस लगातार विधायकों की बैठकों और एकजुटता पर जोर दे रही है। भाजपा की रणनीति भी काफी आक्रामक दिखाई दे रही है। पार्टी नेताओं के बयान साफ संकेत दे रहे हैं कि भाजपा कांग्रेस की सीट पर भी नजर बनाए हुए है। भाजपा मानती है कि कांग्रेस के अंदर असंतोष है और यदि राजनीतिक परिस्थितियां बनीं तो तीसरी सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार राज्यसभा चुनाव केवल सांसद चुनने तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव 2028 के विधानसभा चुनावों की दिशा भी तय कर सकता है। भाजपा राज्यसभा के जरिए संगठन और सामाजिक संतुलन मजबूत करना चाहती है, जबकि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखकर यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी अभी भी मुकाबले में है। वैसे तो महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राज्यसभा चुनावों के जरिए दिल्ली की राजनीति में भी संदेश जाता है। भाजपा यदि अपने मजबूत और भरोसेमंद चेहरों को राज्यसभा भेजती है तो केंद्र में मध्य प्रदेश की भूमिका और मजबूत होगी। वहीं कांग्रेस यदि अपनी सीट बचाने में सफल रहती है तो यह उसके लिए मनोबल बढ़ाने वाला परिणाम होगा।कुल मिलाकर मध्य प्रदेश का राज्यसभा चुनाव इस बार बेहद रोचक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। भाजपा संख्या बल के आधार पर मजबूत दिख रही है, लेकिन कांग्रेस भी अपनी एक सीट बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। आने वाले दिनों में दावेदारों के नामों को लेकर दिल्ली से लेकर भोपाल तक बैठकों का दौर तेज होगा और अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान ही करेगा। फिलहाल इतना तय है कि राज्यसभा चुनाव के बहाने मध्य प्रदेश की राजनीति में गर्मी बढ़ चुकी है।

Wednesday, May 27, 2026

सिंधिया समर्थकों की इस्तीफे की तैयारी


भोपाल। मध्य प्रदेश बीजेपी में निगम-मंडलों और प्राधिकरणों की नियुक्तियों के बाद अब अंदरूनी नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। सबसे ज्यादा चर्चा सिंधिया खेमे को लेकर हो रही है। पार्टी और सरकार में अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिलने से ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों में बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि कुछ नेता संगठन और पदों से इस्तीफे जैसी रणनीति पर भी विचार कर रहे हैं। दरअसल, मोहन यादव सरकार द्वारा लगातार राजनीतिक नियुक्तियां की जा रही हैं, लेकिन सिंधिया समर्थकों को अब तक सीमित जगह ही मिल पाई है। जबकि 2020 में सत्ता परिवर्तन के दौरान सिंधिया के साथ खड़े रहने वाले कई नेताओं को उम्मीद थी कि उन्हें सरकार और संगठन में अहम जिम्मेदारियां मिलेंगी।

2020 में सत्ता परिवर्तन के हीरो, अब इंतजार में समर्थक

ज्योतिरादित्य सिंधिया जब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए थे, तब उनके साथ कई विधायकों और नेताओं ने भी पार्टी बदली थी। उसी राजनीतिक घटनाक्रम ने कमलनाथ सरकार गिराई और बीजेपी को दोबारा सत्ता में पहुंचाया। उस दौर में सिंधिया समर्थकों का प्रभाव सरकार और संगठन दोनों में साफ दिखाई देता था। शिवराज सरकार में सिंधिया खेमे के नेताओं को मंत्री पद और संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिली थीं। लेकिन अब हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं। निगम-मंडलों की सूची में सिंधिया समर्थकों को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में असंतोष बढ़ रहा है।

कई बड़े चेहरे अब भी इंतजार में

सिंधिया खेमे के जिन नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद थी, वे अब भी इंतजार कर रहे हैं। इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसौदिया, गिर्राज दंडोतिया, रघुराज कंसाना, मुन्नालाल गोयल और रक्षा संतराम सरोनिया जैसे कई नेताओं को अब तक कोई अहम पद नहीं मिला है। अब तक हुई नियुक्तियों में सिंधिया समर्थकों में सिर्फ दो नाम—सुधीर गुप्ता और अशोक शर्मा—को ही जगह मिल पाई है। यही वजह है कि समर्थकों के बीच यह संदेश जा रहा है कि पार्टी में सिंधिया खेमे का प्रभाव पहले जैसा मजबूत नहीं रहा।

इस्तीफे की अटकलों ने बढ़ाई हलचल

बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो कुछ सिंधिया समर्थक नेता लगातार खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि यदि आने वाले समय में राजनीतिक संतुलन नहीं साधा गया तो कुछ नेता संगठनात्मक पदों या जिम्मेदारियों से इस्तीफा देकर दबाव की राजनीति अपना सकते हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर किसी नेता ने इस्तीफे की बात नहीं कही है, लेकिन अंदरखाने बढ़ती नाराजगी को बीजेपी नेतृत्व गंभीरता से देख रहा है।

विरोधियों को मिली जगह, बढ़ी नाराजगी

सिंधिया समर्थकों की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में सिंधिया के विरोधी माने जाने वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिली हैं। केपी यादव और रामनिवास रावत जैसे नेताओं को अहम पद मिलने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि पार्टी अब नए शक्ति संतुलन पर काम कर रही है।

बीजेपी का फोकस अब संगठन आधारित राजनीति पर?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब प्रदेश में किसी एक नेता या गुट पर निर्भर रहने के बजाय संगठन आधारित राजनीति को मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश संगठन अपनी अलग कार्यशैली के साथ राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। फिलहाल, निगम-मंडलों की नियुक्तियों ने बीजेपी के भीतर सिंधिया खेमे की स्थिति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है। अब सभी की नजर आने वाले दिनों में होने वाली अगली राजनीतिक नियुक्तियों और संगठनात्मक फैसलों पर टिकी है, क्योंकि वही तय करेंगे कि बीजेपी में सिंधिया समर्थकों की नाराजगी शांत होती है या सियासी संकट और गहराता है।


योगमय हुआ खजुराहो, शुरू हुआ काउंटडाउन

खजुराहो। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के 25 दिवसीय काउंटडाउन के अवसर पर विश्व धरोहर नगरी खजुराहो में “योग महोत्सव 2026” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वर्चुअली संबोधित करते हुए योग और भारतीय संस्कृति के महत्व पर जोर दिया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि योग और खजुराहो, दोनों ही भारतीय संस्कृति के अभिन्न स्तंभ हैं। योग भारत की प्राचीन परंपरा और जीवन पद्धति का प्रतीक है, जबकि खजुराहो भारतीय कला, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत की पहचान है। उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संतुलन का माध्यम भी है। सीएम डॉ. यादव ने कहा कि राज्य सरकार योग को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़कर स्वस्थ, जागरूक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध समाज के निर्माण की दिशा में लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने लोगों से नियमित योग अपनाने और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने की अपील भी की। कार्यक्रम में योग साधकों, विद्यार्थियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। विश्व प्रसिद्ध खजुराहो की ऐतिहासिक धरोहरों के बीच आयोजित योग महोत्सव ने भारतीय संस्कृति और योग परंपरा की विशेष छाप छोड़ी। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 को लेकर प्रदेशभर में विभिन्न कार्यक्रमों और जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। खजुराहो में आयोजित यह योग महोत्सव उसी श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।




Saturday, May 23, 2026

इस बार एमपी बीजेपी में राज्यसभा के लिए बड़ी सुगबुगाहट!

 


भोपाल। मध्यप्रदेश बीजेपी में राज्यसभा चुनाव को लेकर अंदरखाने हलचल तेज हो गई है। पार्टी भले अभी खुलकर कुछ नहीं कह रही, लेकिन भोपाल से लेकर दिल्ली तक बैठकों और नामों की चर्चाओं ने सियासी गलियारों का तापमान बढ़ा दिया है। इस बार बीजेपी सिर्फ सीट भरने नहीं, बल्कि बड़े सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। सूत्रों के मुताबिक मोहन सरकार के दो वरिष्ठ मंत्रियों के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। संगठन और सरकार में सक्रिय इन चेहरों को दिल्ली भेजने के विकल्प पर पार्टी मंथन कर रही है। हालांकि अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर होना है, लेकिन दावेदारों की सक्रियता लगातार बढ़ती नजर आ रही है। सबसे ज्यादा चर्चा आदिवासी प्रतिनिधित्व को लेकर है। मौजूदा राज्यसभा सांसद सुमेर सिंह सोलंकी एक बार फिर मौका पाने के लिए प्रयासरत बताए जा रहे हैं। लेकिन पार्टी के भीतर इस बार नए आदिवासी चेहरे को आगे लाने की भी चर्चा तेज है। बीजेपी आगामी चुनावों से पहले आदिवासी वोट बैंक को बड़ा संदेश देने की तैयारी में मानी जा रही है। वहीं केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन की सीट को लेकर भी सस्पेंस बना हुआ है। सूत्रों का दावा है कि पार्टी इस सीट पर फिर किसी बाहरी लेकिन राष्ट्रीय स्तर के चेहरे को मौका दे सकती है। यानी मध्यप्रदेश से राज्यसभा भेजकर राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण साधने की तैयारी भी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार बीजेपी में दावेदारों की संख्या ज्यादा और सीटें सीमित हैं। ऐसे में संगठन अनुभव, सामाजिक समीकरण और केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे — तीनों का संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि कई बड़े नेता इन दिनों दिल्ली और भोपाल के बीच ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। कुल मिलाकर बीजेपी में राज्यसभा को लेकर “साइलेंट पॉलिटिक्स” तेज हो चुकी है। अब नजर सिर्फ इस बात पर है कि पार्टी संगठन के भरोसेमंद चेहरों पर दांव लगाएगी या फिर किसी नए नाम से सबको चौंकाएगी।

राज्यसभा के लिए "नाथ के साथ" दिल्ली


भोपाल। मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच कांग्रेस की इकलौती सीट पर सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी नाम की है, तो वो है पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ। पार्टी के भीतर भले कई चेहरे दावेदारी कर रहे हों, लेकिन सियासी गलियारों में सबसे मजबूत पकड़ अब भी “नाथ परिवार” की मानी जा रही है। यही वजह है कि राज्यसभा की इस एक सीट को लेकर कांग्रेस में अंदरखाने मंथन तेज हो गया है। 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के खाते में एक सीट आना लगभग तय माना जा रहा है। लेकिन इस सीट पर उम्मीदवार कौन होगा, यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है। सूत्रों की मानें तो क्रॉस वोटिंग के डर और संगठनात्मक पकड़ को देखते हुए पार्टी का एक बड़ा वर्ग कमलनाथ के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश में जुटा है। दरअसल, कमलनाथ सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि प्रदेश कांग्रेस में सबसे मजबूत राजनीतिक नेटवर्क रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। विधायकों पर पकड़, संसाधन जुटाने की क्षमता और दिल्ली दरबार तक सीधी पहुंच उन्हें बाकी दावेदारों से अलग खड़ा करती है। यही वजह है कि जब भी कांग्रेस मुश्किल में होती है, नजरें फिर “नाथ फैक्टर” पर टिक जाती हैं। सियासी चर्चा यह भी है कि अगर कमलनाथ राज्यसभा जाते हैं, तो छिंदवाड़ा से लेकर भोपाल तक कांग्रेस की राजनीति में बड़ा संदेश जाएगा। पार्टी के भीतर इसे “अनुभव बनाम प्रयोग” की लड़ाई के तौर पर भी देखा जा रहा है। राहुल गांधी की नई टीम युवा चेहरों को आगे बढ़ाना चाहती है, लेकिन मध्यप्रदेश में संगठन की जमीनी हकीकत अब भी कमलनाथ के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। हालांकि दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, जीतू पटवारी और कमलेश्वर पटेल जैसे नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं, लेकिन पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि इस समय कांग्रेस किसी “रिस्क” के मूड में नहीं दिख रही। यही कारण है कि कमलनाथ का नाम लगातार सबसे ऊपर चल रहा है। दिलचस्प बात यह भी है कि पिछले कुछ महीनों में कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ की राजनीतिक सक्रियता फिर बढ़ी है। दिल्ली से लेकर छिंदवाड़ा तक लगातार बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं ने यह संकेत दिए हैं कि “नाथ परिवार” अभी भी प्रदेश कांग्रेस की धुरी बना हुआ है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या कांग्रेस हाईकमान एक बार फिर मध्यप्रदेश में कमलनाथ पर भरोसा जताएगा? या फिर पार्टी किसी नए चेहरे पर दांव लगाकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करेगी? फिलहाल कांग्रेस की इस एक सीट ने पूरे प्रदेश की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है।

हनीट्रेप में एमपी के कौनसे माननीय!


भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों मौसम गर्मी से नहीं, बल्कि “Honeytrap 2.0” की फुसफुसाहटों से ज्यादा तप रहा है। सत्ता के गलियारों में अचानक पुराने चैट डिलीट होने लगे हैं, कुछ माननीयों ने फोन बदल लिए हैं, तो कुछ अब हर कॉल पर “भाई रिकॉर्डिंग तो नहीं हो रही?” पूछकर बात शुरू कर रहे हैं। अब “हनीट्रैप पार्ट-2” ने फिर कई बड़े चेहरों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इस बार चर्चा सिर्फ अफसरों या कारोबारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कुछ माननीयों और रसूखदार नेताओं के नाम भी सत्ता के कॉरिडोर में तैरते बताए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक इस पूरे नेटवर्क का तरीका बेहद फिल्मी लेकिन खतरनाक था। पहले सोशल मीडिया या जान-पहचान के जरिए संपर्क, फिर दोस्ती, फिर निजी मुलाकातें और वीडियो कॉल… और उसके बाद शुरू होता था “वीडियो वाले रिश्तों” का असली खेल। इस पूरे मामले में सागर की “मिस्ट्री गर्ल” रेशू उर्फ अभिलाषा चौधरी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। उसके कथित ऑडियो और चैट सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में बेचैनी और बढ़ गई है। कहा जा रहा है कि उसके संपर्क सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं थे, बल्कि भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर और रीवा तक फैले हुए थे। सबसे ज्यादा सनसनी उस दावे ने फैलाई है, जिसमें 100 से ज्यादा आपत्तिजनक वीडियो होने की चर्चा है। हालांकि जांच एजेंसियों ने किसी विधायक या नेता का नाम आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन सत्ता के गलियारों में हर कोई यही जानना चाहता है — “आखिर वो माननीय कौन हैं?” सूत्र यह भी बता रहे हैं कि कुछ वीडियो को लेकर कथित सौदेबाजी और “मैनेजमेंट” की कोशिशें भी हुईं। यही वजह है कि अब SIT गठन की चर्चाएं भी तेज हैं और कई लोग डर रहे हैं कि कहीं अगला खुलासा राजनीतिक भूचाल न ले आए।फिलहाल जांच जारी है… लेकिन भोपाल की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द शायद यही है -“भाई, चैट डिलीट कर देना…”